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रविवार, नवंबर 28

कहानी एक दिन की

कहानी एक दिन की

दिनकर का हाथ बढ़ा

उजियारा दिवस चढ़ा,

अंतर में हुलस उठी

दिल पर ज्यों फूल कढ़ा !


अपराह्न की बेला

किरणों का शुभ मेला,

पढ़कर घर लौट रहे

बच्चों का है रेला !


सुरमई यह शाम है

तुम्हरे ही नाम है,

अधरों पर गीत सजा

दूजा क्या काम है !


बिखरी है चाँदनी

गूंजे है रागिनी,

पलकों में बीत रही

अद्भुत यह यामिनी !


रविवार, अगस्त 23

महाभूत जो महादेव का

महाभूत जो महादेव का

 

कल-कल, छल-छल, सलिला का जल 

अविरल निर्मल  बहता रहता, 

जल जीवन को धारण करता 

भू को सिंचित करता बढ़ता !

 

दिनकर रश्मियों संग वाष्पित 

चंचल अनिल उड़ा ले जाता, 

जल धारा बना पुनः धरा पर 

नदियां नाले पोखर भरता !

 

बादल बन अम्बर में रहता 

पावन शीतल नीर बरसता,

पशु, पादप, कीट, विटज, मानव 

सर्व प्राण की तृषा बुझाता !

 

महाभूत जो महादेव का 

जल तत्व को सभी जन चाहें,

नहीं हो दूषित, व्यर्थ बहे न

जल के देव वरुण को ध्याएँ !

 

सरस बनाता, स्वाद जगाता 

अंगों को रखता कोमलतम, 

जल ना हो तो जल जाए जग  

जल है सत्यम शिवम सुंदरम !

 

बुधवार, सितंबर 13

जाने कब वह घड़ी मिलेगी

जाने कब वह घड़ी मिलेगी 

 
तुमको ही तुमसे मिलना है 
खुला हुआ अविरल मन उपवन, 
जब जी चाहे चरण धरो तुम
सदा गूंजती मृदु धुन अर्चन ! 

न अधैर्य से कंपतीं श्वासें 
शुभ्र गगन से छाओ भीतर, 
दिनकर स्वर्ण रश्मि बन छूओ
कुसुमों की या खुशबू बनकर ! 

कभी न तुमको बिसराया है 
जगते-सोते याद तुम्हारी, 
उठती-गिरती पल में झलके 
मेघों में ज्यों द्युति चमकारी ! 

जाने कब वह घड़ी मिलेगी 
कब ढ़ुलकोगे अमी कलश से, 
टूटेंगी कब सीमाएं सब 
प्रकटोगे श्यामल झुरमुट से ! 

अब जो भी बाधा है पथ में
वह भी दूर तुम्हें करनी है 
सौंप दिया जब शून्य, शून्य में 
तुम्हें कालिमा भी हरनी है ! 

मंगलवार, जुलाई 22

टेर लगाती इक विहंगिनी

टेर लगाती इक विहंगिनी




इन्द्रनील सा नभ नीरव है
लो अवसान हुआ दिनकर का,
इंगुर छाया पश्चिम में ज्यों  
हो श्रृंगार सांध्य बाला का !

उडुगण छुपे हुए जो दिन भर
राहों पर दिप-दिप दमकेंगे,
तप्त हुई वसुधा इतरायी
शीतलता चंद्रमा देंगे !

उन्मीलित से सरसिज सर में
सूर्यमुखी भी ढलका सा है,
करे उपराम भास्कर दिन का 
अमी गगन से छलका सा है !

कर-सम्पुट  में भरे पुष्पदल
संध्या वन्द करें बालाएं,
कन्दुक खेलें बाल टोलियाँ
लौट रहीं वन से चर गाएं !

तिमिर घना ज्यों कुंतल काले
संध्या सुंदरी के चहुँ ओर,
टेर लगाती इक विहंगिनी
केंका करते लौटें मोर !



सोमवार, अगस्त 6

तब आता है बसंत


पिछली पोस्ट से आगे 

तब आता है बसंत में मौसम और प्रेम एक दूसरे पर किस तरह आश्रित हैं, इसका परिचय मिलता है. प्रकृति में होते बदलाव जहाँ एक ओर ऋतु परिवर्तन का संदेश देते हैं, वहीं प्रिय से मिलने की प्रेरणा भी बन जाते हैं

सरसों सा बिखर जाता है
दिनकर का रंग
गूंजता है
दोपहर के सूने में
कोयल का स्वर पचंम
तब आता है बसंत

...

धूल में मिश्रत सा लगता है
जब इन्द्रधनुष के अबीर का सँग
तब आता है बसंत
....
कहता है मौसम
खत्-खत् नहीं..
होता है जब प्रत्यक्ष ही आमन्त्रण
तब आता है बसंत

....
जब लौटकर नहीं आते
प्रेषित प्रेम-पत्र बैरंग
तब आता है बसंत

अंतिम दो कवितायें कवि की उस अनवरत तलाश को बयान करती हैं, जो उसे निरंतर बेचैन किये है

एक निराकार, एक आकार सचित्र

सिर्फ तुम्हारी तस्वीरों तक ही
मैं कैसे रह सकता हूँ सीमित
तुम्हें तलाशते हुए
भटक रहा हूँ
जंगल जंगल, पर्वत पर्वत
रोक लेता है मुझे पर
यह क्षितिज
....
..
कभी कभी तो लगता है
मैं ही आइना हूँ
मैं ही हूँ बिम्ब और प्रतिबिम्ब
...
तुम्हारे स्पर्श से जान सकूं कि
हृदय की भावनाएँ सच्ची होती हैं
नहीं होती हैं अज्ञात दर्द से भरी हुई
मात्र टीस
सत्य के दोनों होते हैं रूप
एक निराकार, एक आकार सचित्र

मैं हूँ निर्दोष

मैं हूँ निर्दोष
यह तो इस मौसम का है दोष
इसलिए तुम्हें मेरी निगाहें रही हैं खोज
....
प्यास बुझी नहीं
कह रही कलियाँ
पीकर शबनम की बूंदें अनमोल
धूप कह रही
बादलों के बिना कितना
अकेला लग रहा है
यह नीलाम्बर
....
इंतजार में ही है आनंद
सुंदरता के पग में बंधी  
घुंघुरुओं का स्वर कर रहा
मुझे आत्मविभोर
...
..
किशोर कुमार जी कि कविताओं को पढ़ते हुए कभी-कभी मुझे गीतांजली की स्मृति हो आयी, हम सबके भीतर एक अमूर्त प्रेम सदा जागृत रहता है उस अनाम अस्तित्त्व के नाम...उसी की याद दिलाती हैं ये कवितायें आशा है आप सभी सुधी पाठक भी इनका रसास्वादन करेंगे.