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शनिवार, जुलाई 12

गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर आप सभी को शुभकामनायें

सद्गुरू 

तू वसंत है खिला अनवरत
तू सुगंध है अनुपम जग की,
बेशकीमती हीरा जैसे
तू चाहत है हर इक मन की !

है अनंत विस्तार तुम्हारा
कण-कण को जो स्पर्श कर रहा,
प्रीत धार से सदा भिगोये
मेघ समाधि समान झर रहा !

कोमल अति हर भाव उमगता
शब्द-शब्द से अमृत झरता,
धरा धन्य भागी आया  तू 
निशदिन नभ में मंगल भरता !

पंकज सम तू पार जगत से   
राज हंस सा मोती चुगता,
शीतल निर्मल गंगा जल सा
पल-पल उर में ज्ञान उमगता !

सुर मधुरिम तेरे अधरों पर
नर्तन कालातीत हो रहा,
नाद ब्रह्म की करे साधना
मौन अखंडित गीत हो रहा !

पँखुरी-पँखुरी खिला फूल सा
दूब घास सा परस अनोखा,
सत्य ओढ़ता शिव सुंदर तू
तुझसे खुलता परम झरोखा !

रेशम-रेशम नजर हुई है
अलंकार मुस्कान बनी है,
केसर, चन्दन, रोली, अक्षत
हर मुद्रा ही प्रीत सनी है !

है अनहत में वास तुम्हारा,
अविकल, अविचल नूर झलकता,
सदा एकरस अलख निरंजन
 मृदु मधु मद सम अमी टपकता !

शब्द खो गये उस घट रहते
भावों के भी पार ठिकाना,
वाणी रुद्ध हुई है अब तो
किसने राज तुम्हारा जाना !