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बुधवार, जून 9

नूतन तरु के गात हो रहे

 नूतन तरु के गात हो रहे 

निर्मल गंगाजल से बहते  

तुम ही श्यामल घन बन बरसे, 

चिन्मय ! चेतनता बन रहते 

है कण-कण में गति भी तुमसे !


खो, पुनः-पुनः तुम्हें पाना है 

जैसे दिन और रात हो रहे, 

नित नवीन संबंध जुड़े ज्यों 

 नूतन तरु के गात हो रहे !


शब्दों को आशय तुम देते 

वाणी के तुम संवाहक हो, 

तुम्हीं प्रेरणा लक्ष्य भी तुम्हीं 

शुभता के शाश्वत वाहक हो !


तुम बिन रहे अधूरा सा सब 

जीवन अर्थवान हो तुमसे, 

मननशील हो मानस जिनका 

मनुज वही बन पाते ऐसे !


मंगलवार, मार्च 10

धरा गा रही ॐ गीत में


धरा गा रही ॐ गीत में



उसका ही संदेश सुनाते
पंछी जाने क्या कह जाते,
प्रीत भरे अपने अंतर में
वारि भरे मेघ घिर जाते !

मूक हुए तरु झुक जाते जब
उन चरणों में फूल चढ़ाते,
हवा जरा हिचकोले देती
झूमझूम कर नृत्य दिखाते !

तिलक लगाता रोज भाल में
रवि भी मुग्ध हुआ प्रीत में,
चन्द्र आरती थाल सजाता
धरा गा रही ॐ गीत में !

कण-कण करता है अभिनन्दन
अनल, अनिल, भू, नीर, गगन
दिशा –दिशा में वही बसा है
पग-पग पर उसके ही चरण !