नूतन तरु के गात हो रहे
निर्मल गंगाजल से बहते
तुम ही श्यामल घन बन बरसे,
चिन्मय ! चेतनता बन रहते
है कण-कण में गति भी तुमसे !
खो, पुनः-पुनः तुम्हें पाना है
जैसे दिन और रात हो रहे,
नित नवीन संबंध जुड़े ज्यों
नूतन तरु के गात हो रहे !
शब्दों को आशय तुम देते
वाणी के तुम संवाहक हो,
तुम्हीं प्रेरणा लक्ष्य भी तुम्हीं
शुभता के शाश्वत वाहक हो !
तुम बिन रहे अधूरा सा सब
जीवन अर्थवान हो तुमसे,
मननशील हो मानस जिनका
मनुज वही बन पाते ऐसे !

