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सोमवार, अक्टूबर 11

भू से लेकर अंतरिक्ष तक


भू से लेकर अंतरिक्ष तक

कोई अपनों से भी अपना 
निशदिन रहता संग हमारे,
मन जिसको भुला-भुला देता 
जीवन की आपाधापी में !

कोमल परस, पुकार मधुर सी 
अंतर पर अधिकार जताता,
नजर फेर लें घिरे मोह में 
प्रीत सिंधु सनेह बरसाता !

साया बनकर साथ सदा है 
नेह सँदेसे भेजे प्रतिपल,
विरहन प्यास जगाये उर में 
बजती जैसे मधुरिम कलकल  ! 

अखिल विश्व का स्वामी खुद ही 
रुनझुन स्वर से प्रकट हो रहा,
भू से लेकर अंतरिक्ष तक
कैसा अद्भुत नाद गूँजता ! 

कान लगाओ, सुनो जागकर 
वसुधा में अंकुर गाते हैं,
सागर की उत्ताल तरंगे 
नदियों के भंवर भाते हैं !

जागें नैना मन भी जागे
चेतनता कण-कण से फूटे,
मेधा जागे, स्वर प्रज्ञा के 
हर प्रमाद अंतर से हर ले ! 

शुक्रवार, दिसंबर 4

लहराएगा मुक्त गगन में

लहराएगा मुक्त गगन में


अभी खोल में ढका बीज है 
अभी बंद है उसकी दुनिया, 
उर्वर कोमल माटी  पाकर 
इक दिन सुंदर वृक्ष बनेगा !

जल से निर्मल भरे ताजगी
धरती से गर्माहट उर में, 
नृत्य पवन से भर-भर पल्लव  
लहराएगा मुक्त गगन में !

शाखाओं पर पंछी आकर 
बैठेंगे मृदु गान सुनाने,
फूलों के खिलने की आशा 
उस पादप के मन अंकुराने !

वही बीज फिर फूल बना नव
खिल जाएगा रूपरंग में, 
भँवरे तितली कीट अनेकों 
गुनगुन गाकर उसे रिझाएं 

मिलन घटेगा अस्तित्व से 
फल बनकर फिर बीज धरेगा, 
जहाँ से आ क्रीड़ा रची यह 
उस भू में रोपा जाएगा !

छुपा बीज में राज सृष्टि का 
खिलकर मुक्त हास जो बांटे, 
तृप्त हुआ वह उर मुस्काता 
सहज गुजर जाता इस जग से !

सोमवार, अगस्त 24

धरती सदा लुटाती वैभव

 

धरती सदा लुटाती वैभव

 

धरती हर तन को धारे है 

वसुधा तप से प्राणी हैं थिर, 

पृथ्वी का आकर्षण बाँधे

भूमि में ही मिलेंगे इक दिन ! 

 

छिपे धरा में मोती-माणिक 

नदियाँ बहतीं हिम शिखरों से, 

रुधिर नाड़ियों में संचारित 

अनगिन राज छिपे नर तन में !

 

भू भ्रमण चले अपने धुर पर  

परिक्रमा रवि की भी करती, 

तन भी मुड़-मुड़ देखे खुद को 

प्रदक्षिणा सविता मेधा की !

 

धरा स्थूलतम टिकी सूक्ष्म पर 

देह भी मन के रहे आश्रित, 

मन में मृत यदि जीवन आशा 

कर देता है इसे विखण्डित !

 

धरा शुद्ध हो कुसुम खिलाये 

शुभ सुंदर लावण्य लुभाये, 

नयन हँसे रोम-रोम पुलकित 

गालों पर गुलाब खिल जाएँ ! 

 

महाभूत यह महादेव का 

धरती सदा लुटाती वैभव, 

कैसे यह उपकार चुकेगा 

सदा बिखेरे करुणा सौरभ !

 

 

मंगलवार, जनवरी 3

कौन बहाए नदिया निर्झर


कौन बहाए नदिया निर्झर

कुह कुह कलरव भ्रमरों के स्वर 
मर्मर राग भरे हैं भीतर, 
कौन सजाए  कोमल झुरमुट 
कौन बहाए नदिया निर्झर !

पुलक चकित शावक के दृग में 
गतिमय  मृगदल अति सुरम्य,
रूप-रंग विचित्र सृजे हैं 
एक अनोखा लोक अरण्य !

गहन शांति में सोयी हो ज्यों 
नीरव तट पर मौन धरे,
बही ज्योत्स्ना पूर्ण चन्द्र से 
तपती भू का ताप हरे !

एक योजना से चलती है 
गुपचुप-गुपचुप सारी क्रीड़ा,
पटाक्षेप उसी दिन होगा 
काल हरेगा सारी पीड़ा !



गुरुवार, दिसंबर 29

नया वर्ष भर झोली आया


नया वर्ष भर झोली आया 

मन  निर्भार हुआ जाता है 

अंतहीन है यह विस्तार,
हंसा चला उड़ान भर रहा 
खुला हुआ अनंत का द्वार !

मन श्रृंगार हुआ जाता है 

नया-नया ज्यों फूल खिला हो,
पंख लगे सुरभि गा आयी 
हर तितली को संदेश मिला हो !

मन उपहार हुआ जाता है 

बीत गया जो भी जाने दें,
नया वर्ष भर झोली आया 
  खुलने दें पट नव क्षितिजों के !  

मन मनुहार हुआ जाता है 

रूठ गये जो उन्हें मना लें,
सांझी है यह धरा सभी की 
झाँक नयन संग नगमे गा लें ! 

मन बलिहार हुआ जाता है 

पंछी के सुर, नदिया का जल,
पलकों की कोरें लख छलकें 
हरा-भरा सा भू का आंचल  !




मंगलवार, मार्च 10

धरा गा रही ॐ गीत में


धरा गा रही ॐ गीत में



उसका ही संदेश सुनाते
पंछी जाने क्या कह जाते,
प्रीत भरे अपने अंतर में
वारि भरे मेघ घिर जाते !

मूक हुए तरु झुक जाते जब
उन चरणों में फूल चढ़ाते,
हवा जरा हिचकोले देती
झूमझूम कर नृत्य दिखाते !

तिलक लगाता रोज भाल में
रवि भी मुग्ध हुआ प्रीत में,
चन्द्र आरती थाल सजाता
धरा गा रही ॐ गीत में !

कण-कण करता है अभिनन्दन
अनल, अनिल, भू, नीर, गगन
दिशा –दिशा में वही बसा है
पग-पग पर उसके ही चरण !