मंगलवार, जुलाई 22

टेर लगाती इक विहंगिनी

टेर लगाती इक विहंगिनी




इन्द्रनील सा नभ नीरव है
लो अवसान हुआ दिनकर का,
इंगुर छाया पश्चिम में ज्यों  
हो श्रृंगार सांध्य बाला का !

उडुगण छुपे हुए जो दिन भर
राहों पर दिप-दिप दमकेंगे,
तप्त हुई वसुधा इतरायी
शीतलता चंद्रमा देंगे !

उन्मीलित से सरसिज सर में
सूर्यमुखी भी ढलका सा है,
करे उपराम भास्कर दिन का 
अमी गगन से छलका सा है !

कर-सम्पुट  में भरे पुष्पदल
संध्या वन्द करें बालाएं,
कन्दुक खेलें बाल टोलियाँ
लौट रहीं वन से चर गाएं !

तिमिर घना ज्यों कुंतल काले
संध्या सुंदरी के चहुँ ओर,
टेर लगाती इक विहंगिनी
केंका करते लौटें मोर !



8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 23 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आनंद का संचार कर रही है यह रचना.

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  3. दृश्य बिम्ब का सुन्दर प्रयोग ... बहुत सुन्दर अनीता जी !

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  4. यशोदा जी, मानव जी, निहार जी, शालिनी जी, व मनोज जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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