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रविवार, फ़रवरी 6

वासन्ती हवा

वासन्ती हवा


धूप ने पिया जब फूलों का अर्क

भर गयी ऊर्जा उसके तन-बदन में....

कल तक नजर आती थी जो कृश और कुम्हलाई

आज कैसी खिल गयी है...

वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !


वसुधा ने भी ली है अंगड़ाई

भर दिया सहज  वनस्पतियों में यौवन

सिकुड़ी, सूखी सी दिखती थीं जो डालें कल तक 

पल्लवों से मिल गयी है

वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !


पाले में ढके, कोहरे में खेत

झूमते पा परस वासन्ती हवा का

चुप सी खड़ी थी जो सरसों की हर वह कली कल 

फूल बन घर से गयी है

वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !


उर में हुलस उठी बाल-युवा सभी 

शीत से बेहाल घरों में क़ैदी थे  , 

हुल्लड मचाने टोली उनकी मिलजुल कर आज 

दोस्तों के घर गयी है

वसंत के आने की खबर उसको भी मिल गयी है !


मंगलवार, मार्च 17

आहट भर पाकर मधु रुत की


आहट भर पाकर मधु रुत की



बासंती चुनरिया ओढ़े
हौले हौले से धरती पग,
सरकाती पल भर ही घूँघट
विस्मय से भर जाता है जग !

आहट भर पाकर मधु रुत की
कवि मुग्ध हुए रचते दोहे,
मधुबन की अनुपम सौगातें
आखिर किसका न मन मोहे !

नित नूतन भाव उठें उर में
नव पल्लव गीत यही गाते,
तज अनचाहा फिर-फिर जन्में
नव कोंपल यही सिखा जाते !

इक धनक गूँजती कण-कण में
गीतों की जैसे फसल उगे,
मधुमास मदिर पैमाने भर
मुदित हुआ हर भोर जगे !