शनिवार, अगस्त 2

हर लेता हर कंटक पथ का


हर लेता हर कंटक पथ का


तू गाता है स्वर भी तेरे
लिखवाता नित गान अनूठे,
तू ही गति है जड़ काया में
 बन प्रेरणा उर में पैठे !

तू पूर्ण ! हमें पूर्ण कर रहा
नहीं अपूर्णता तुझको भाती,
हर लेता हर कंटक पथ का
हरि बन सारी व्यथा चुरा ली !

किसका रस्ता अब जोहे मन
पाहुन घर में ही रहता है,
हर अभाव को पूर गया जो
निर्झर उर में बहता है !

तिल भर भी रिक्तता न छोड़े
वही उजाला बन कर छाया,
सारे खन्दक, खाई पाटे
समतल उर को कर हर्षाया !

इक कणिका भी अंधकार की
उस ज्योतिर्मय को न भाती,
एक किरण भी उस पावन की
प्रतिपल यही जताने आती !





6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 3/08/2014 को "ये कैसी हवा है" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1694 पर.

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  2. प्रशंसनीय रचना - बधाई


    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    शब्दों की मुस्कुराहट पर ...विषम परिस्थितियों में छाप छोड़ता लेखन

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  3. राजीव जी, अनामिका जी, आशा जी, संजय जी व प्रतिभा जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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