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मंगलवार, अगस्त 24

थिर शांत झील में

थिर शांत झील में 


दूर कहीं जाना नहीं 

निज गाँव आना है 

संसृति को निहारा 

ध्यान अब जगाना है 

खुद को बचाया सदा 

जीवन के खेल में 

भेद सभी खुल गये  

खुद को मिटाना है 

भोर सदा से जहाँ 

मधू ऋतु खिली रहे 

भावों के लोक से 

गुजर वहाँ जाना है 

भ्रम की दीवार गिरे 

पुनः आर-पार दिखे 

सधे होश कदम उठे 

राग मिलन गाना है 

युगों युग बीत गए 

चक्रव्यूह में घिरे 

तोड़ हर राग-द्वेष 

पाना ठिकाना है 

रहा सदा से वहीँ 

सूत भर हिला नहीं 

थिर शांत झील में 

चाँद को समाना है 

दूर नहीं जाना कहीं

निज गाँव आना है