शनिवार, सितंबर 4

एक खुला पत्र

एक खुला पत्र
मेरे प्यारे बेटे,
खुश रहो,

आज सुबह ही मुझे यह विचार आया कि क्यों न तुम्हें एक पत्र लिखकर वह सब कहूँ जो फोन पर कहना सम्भव नहीं है. मैंने कॉलेज की पढ़ाई घर पर रह कर ही की. पर तुम्हें पिछले कई वर्षों से घर से बाहर रहना पड़ रहा है, जो सुविधाएँ तथा स्वास्थ्य घर पर रह कर हम सहज ही पा सकते हैं, वह बाहर नही मिल पाता, वहाँ हमें कोई अनुशासित करने वाला नहीं होता, अपनी समझ से जो हमें भाए वैसी दिनचर्या हम अपना लेते हैं. कोई यदि अनुशासन प्रिय हो तो वह अपने को एक नियमित दिनचर्या देने में सफल हो जाता है वरना अधिकतर तो जब जैसा अवसर मिला खा लिया, जब समय मिला सो गए. इस अनियमितता का असर तन तथा मन दोनों पर पड़ता है. हमारे भीतर एक शक्ति है जिसे किसी ने ‘आत्मा’ कहा किसी ने ‘ईश्वर’ कहा, उसे जो भी नाम दो चाहे ‘नियम’ कहो या ‘कुदरत’ कहो या ‘अपना-आप’ कहो वह शक्ति हमारे तन, मन, व बुद्धि सभी पर निरंतर नजर रखे हुए है. वह हमारी स्वतंत्रता में बाधा नहीं देती, पर सदा हमारा ध्यान रखती है, उससे जुड़े रहकर हम सहज ही प्रसन्न व स्वस्थ रहते हैं, लेकिन जब हमारी दिनचर्या ठीक नहीं रहती, या तनाव, परेशानी, उदासी से मन घिर जाता है तो एक आवरण उस शक्ति तक हमें पहुंचने नहीं देता, हम ‘स्व’ में स्थित नहीं रह पाते, अर्थात ‘स्वस्थ’ नहीं रह पाते. सजग और प्रफ्फुलित मन इस बात की निशानी है कि हम उस स्रोत से जुड़े हैं. खुशी हमारा स्वभाव बन जाये तो हम उसके निकट ही हैं.
हम अपने जीवन द्वारा अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों तथा वातावरण को सकारात्मक रूप से कितना प्रभावित कर पाते हैं इस पर भी मन की सहज प्रसन्नता निर्भर करती है. केवल स्वयं के लिये सुख-सुविधाओं को जुटाना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है, मानव होने के बाद यदि कोई सदा खुद के बारे में ही सोचता रहे तो दुःख व शोक से उसका छुटकारा होना सम्भव नहीं है, क्योंकि हर इन्द्रिय सुख अपने पीछे एक दुःख को छिपाए है. जब हम अपने कार्य द्वारा खुशी चाहते हैं तभी तनाव भी होता है, कुछ करके उसके फल द्वारा प्रसन्नता चाहना सदा एक अनिश्चितता में रहना है, क्योकि फल तो हमारे हाथ में है नहीं, इसी तरह अपने काम पर दूसरों की राय जानने कि इच्छा, अन्यों का अनुमोदन पाने की इच्छा भी हमें गुलाम बनाती है, कुछ करके दिखाने की इच्छा भी परतंत्रता की निशानी है. तो क्या हमें कर्म त्याग देना है ? नहीं, हमें अपना कार्य पूरे मन से करना है, करते हुए ही आनंद का अनुभव करते जाना है फल आने तक उसे टालना नहीं है. तब हमारा मन समता में रहेगा, तब निर्भर होकर नहीं हम निर्भार होकर जीना सीख जाते हैं. पत्र लम्बा तो हो गया है पर इसमें लिखी बातों पर तुम थोड़ा गहराई से विचार करोगे तथा नियमित जीवन शैली अपनाओगे तो सदा स्वस्थ रहोगे.

स्नेह व शुभकामनाओं सहित
माँ

1 टिप्पणी:

  1. अगर सभी नियमित जीवनशैली के महत्तव को समझ जायें तो यह संसार सब तरह से रोगमुक्त हो जाय.इसके लिए जरूरी है कि तुम जैसे लोग जिन्हे समझ है,वो समय समय पर इस तरह से जागरूक करते रहें.

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