बुधवार, सितंबर 29

जीवन

जीवन

जीवन एक सुनहरा अवसर !

मन अपना ब्रह्म सा फैले
ज्यों बूंद बने सागर अपार
नव कलिका से फुल्ल कुसुम
क्षुद्र बीज बने वृक्ष विशाल I

जीवन एक अनोखा अवसर !

मन यदि अमन बना सुध भूले
खो जाएं बूंदें सागर में
रूप बदल जाए कलिका का
मिट कर बीज मिलें माटी में I

जीवन एक आखिरी अवसर !

लेकिन हम ना मिटना चाहें
मन के गीत सदा दोहराएँ
हम ‘हम’ होकर ही जग में
क्योंकर आसमान छू पाएँ I

जीवन एक पहेली जैसा !

हो जाएँ यदि रिक्त स्वयं से
बूंद बहेगी बन के सरिता
स्वप्न सुप्त कलिका खिलने का
पनपेगा फिर बीज अनछुआ

जीवन यही संदेश दे रहा !

अनिता निहालानी
२९ सितम्बर २०१०

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...मुग्धकारी अतिसुन्दर रचना.!!!!

    मैं आभारी हूँ चर्चा मंच की,जहाँ से आपके ब्लॉग पर आने और इतनी सुन्दर रचना पढने का मुझे सुअवसर मिला...

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  2. सचमुच चर्चा मंच अच्छा कार्य कर रहा है, अन्य कविताएँ भी पढ़ें.

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