सोमवार, सितंबर 20

मन के पार

मन के पार

मन के पार उजाला बिखरा
टप-टप नभ से अमृत उतरा
चेतनता का दीप जला है
अद्भुत ऐसा देश मिला है !

जाग रहा चिरन्तन कोई
सोये नहीं निरंजन सोई
दिप-दिप करता दिव्य प्रकाश
ऐसा भीतर एक आकाश I

रुनझुन सा संगीत बज रहा
मधुरिम कोई गीत बज रहा
स्नेह पगी चाँदनी चमके
टिम-टिम तारावलियाँ दमकें I

मौन पुष्प विहंसता झर-झर
सन्नाटे का मुखरित है स्वर
अविरत पावन गुंजन गूंजे
नेह ताप में कल्मष भूंजे I

पावन पुलक जगी है क्योंकर
संदेशे लायी है मधुकर
अस्त न होता ऐसा दिनकर
पाया सहज उजाला शुभकर I

अनिता निहालानी
२० सितम्बर २०१०

2 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  2. अनुभव ही वह कागज है अनुभव ही वह स्याही, जिससे रचना लिखी नहीं जाती वह लिखवा लेता है!

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