मंगलवार, सितंबर 14

तुम

तुम

तुम हर पल हमें बुलाते हो !

जग से जिस पल खाया धोखा
जब जब दिल ने खायी ठोकर
तुम ही तो पीड़ा बन मिलते
सत्य की झलक दिखलाते हो I

जिनको माना हमने अपना
निकले झूठे वे सब सपने
आधार बनाया था जिनको
छल करना उन्हें सिखाते हो I

पीड़ा भी तुम वरदान तुम्हीं
सब जाल बिछाया है तुमने
जीवन का भेद खोलने को
वैराग्य पाठ पढ़ाते हो I

भीतर जो दर्द उठा गहरा
वह आशा से ही उपजा था
टूटे आशा की डोर तभी
तुम ऐसे खेल रचाते हो I

अनिता निहालानी
१४ सितम्बर २०१०

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