शुक्रवार, मई 27

ब्लॉग जगत के सभी कवियों को समर्पित


कवि से

स्वप्न शील, हे रचनाकार !
उर में कोटि राज छिपाए,
गीत गा रहे युगों-युगों से
अंतर कोष भरा रह जाये !

सृजन शील, हे कलाकार !
नित नूतन तुम शब्द ढालते
नेह मदिरा भर-भर अविरत
प्यासे अधरों पर वारते !

सत्यशील, तुम हो द्रष्टा !
दिव्य दृष्टि पाकर हो हर्षे,
अनावृत तत्व हो जाता
उदघाटित सत्य जब बरसे !

हृदय तुम्हारा कोमल कलि सा
किन्तु शिला सा धैर्य धरे,
सुख में भीगा, कंपा हर दुःख में
निष्कंटक करते पथ चलते !

नहीं ध्येय जग माने तुमको
यही काम्य हर अश्रु लूँ हर,
नहीं हेय जगत में कोई
देखूँ जड़ को भी चेतन कर !

अनिता निहालानी
२७ मई २०११


10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब....तभी कहते हैं जहाँ न पहुँचे रवि वहां पहुँचे कवि....शानदार |

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  2. नहीं हेय जगत में कोई
    देखूँ जड़ को भी चेतन कर !

    यह कवि मन ही होता है जो लगातार कुछ न कुछ सोचता रहता है और उसकी सोच शब्दों में ढल कर नए आयाम स्थापित भी कर सकती है.

    बहुत अच्छी लगी यह कविता भी.

    सादर

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  3. आपके मंगल भाव वन्दनीय हैं.....

    नमन है आपका और आपकी रचनाधर्मिता का ...

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  4. कवि और उसकी सोच शब्दों में ढल कर नए आयाम स्थापित भी कर सकती है.अच्छी लगी कविता ......

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  5. आपकी हर रचना की तरह यह रचना भी बेमिसाल है !

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  6. स्वप्न शील, हे रचनाकार !
    उर में कोटि राज छिपाए,
    गीत गा रहे युगों-युगों से
    अंतर कोष भरा रह जाये !

    बहुत सुंदर रचना. बहुत अच्छी लगी यह कविता. धन्यबाद.

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  7. बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  8. नहीं हेय जगत में कोई
    देखूँ जड़ को भी चेतन कर !
    sunder hriday udgar ...!!badhai.

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