बुधवार, मई 25

संध्या राग


संध्या राग

मसूर की दाल के से
गुलाबी बार्डर वाले
 सुरमई बादल
मानो संध्या ने पहनी हो नई साड़ी
 कुहू-कुहू की तान गुंजाती ध्वनि  
और यह मंद पवन
जाने किस-किस बगिया के
फूलों की गंध लिये
आती है,
ऐसे में लिखी गयी यह पाती
किसके नाम है
क्या तुम नहीं जानते ?
तुम जो भर जाते हो अन्जानी सी पुलक
शिराओं में सिहरन और उर में एक कसक
विरह और मिलन एक साथ घटित होते हैं जैसे
आकाश में एक ओर ढलता है सूरज
तो दूसरी ओर उगता है चाँद !
हरीतिमा में झांकता है तुम्हारा ही अक्स
हे ईश्वर !या तो तुम हो.. या तुम्हारी याद.....

अनिता निहालानी
२५ मई २०११



11 टिप्‍पणियां:

  1. prakriti ka bahut sundar varnan kiya hai anita ji aapke man ke bhav shabdon me nikhar kar aaye hain.badhai.

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  2. हरीतिमा में झांकता है तुम्हारा ही अक्स
    हे ईश्वर !या तो तुम हो.. या तुम्हारी याद.....


    तभी तो छाया है उन्माद ...!!
    बहुत सुंदर भाव अनीता जी ....
    मन झूम गया पढ़ कर ...!!

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  3. मसूर की दाल के से
    गुलाबी बार्डर वाले
    सुरमई बादल
    मानो संध्या ने पहनी हो नई साड़ी

    इन पंक्तियों में बादलों को दी गयी उपमा बहुत प्रभावशाली और मन मोह लेने वाली है.

    सादर

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  4. मसूर की दाल के से
    गुलाबी बार्डर वाले
    सुरमई बादल
    मानो संध्या ने पहनी हो नई साड़ी
    बहुत बेहतरीन वर्णन

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  5. बहुत अच्छी रचना... बधाई...

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  6. बहुत कोमल अभिव्यक्ति!!

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  7. मसूर की दाल के से
    गुलाबी बार्डर वाले
    सुरमई बादल
    कमाल का बिम्ब!

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  8. तुम जो भर जाते हो अन्जानी सी पुलक
    शिराओं में सिहरन और उर में एक कसक
    विरह और मिलन एक साथ घटित होते हैं जैसे
    आकाश में एक ओर ढलता है सूरज
    तो दूसरी ओर उगता है चाँद !

    अनीता जी बहुत सुंदर पंक्तियाँ दिल को छू लेती भावनाये और इश्वर के प्रति समर्पण. शुभकामनायें.

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  9. अनीता जी
    सुभानाल्लाह.....दिल जीत लिया इस पोस्ट ने......मसूर की दाल...वाह....हैट्स ऑफ |

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