सोमवार, जुलाई 4

ऊपर का बंधन तो भ्रम है


आजादी ! आजादी ! आजादी !
मांग है सबकी आजादी,
कीमत देनी पड़ती सबको
फिर भी चाहें आजादी !

नन्हा बालक कसमसाता
हो मुक्त बाँहों से जाने,
किशोर एक विद्रोह कर रहा
माता-पिता के हर नियम से !

नहीं किसी का रोब सहेंगे
तोड़-फोड़ कर यही दिखाते,
हड़तालों से और नारों से
अपनी जो आवाज सुनाते !

इस आजादी में खतरे हैं
बंधन की अपनी मर्यादा,
एक और आजादी भी है
जब बंधन में भी मुक्त सदा !

ऊपर का बंधन तो भ्रम है
मन अदृश्य जाल में कैदी,
उस जाल को न खोला तो
ऊपर की मुक्ति भी झूठी !

छोड़-छाड सब भाग गया जो
सन्यासी जो मुक्त हुआ है,
मन के हाथों बंधा है अब भी
उसको केवल भ्रम हुआ है !

उस असीम की चाह बुलाती
मानव कैद का अनुभव करता,
निमित्त बनता बाहरी बंधन  
असल में उसका मन बांधता !

जिसका रूप अनंत हो व्यापक
कैसे वह फिर कैद रहे,
खुला समुन्दर जैसा है जो
क्योंकर सीमाओं में बहे !

मुक्ति का संदेश दे रहे
खुले व्योम में उड़ते पंछी,
मत बांधो पिंजर में मन को
गा गा गीत सुनाते पंछी !  

जिसके लिये गगन भी कम है
उसे कैद करते हो तन में,
जो उन्मुक्त उड़ान चाहता
कैसे वह सिमटेगा मन में !

पीड़ा यही, यही दुःख साले
सारे बंधन तोड़ना चाहे,
लेकिन होती भूल यहाँ है
असली बंधन न पहचाने !

9 टिप्‍पणियां:

  1. पीड़ा यही, यही दुःख साले
    सारे बंधन तोड़ना चाहे,
    लेकिन होती भूल यहाँ है
    असली बंधन न पहचाने !

    बहुत सटीक रचना ...निर्लिप्त भाव क्या है.....इसका सही ज्ञान होना चाहिए ...

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  2. आजादी ! आजादी ! आजादी !
    मांग है सबकी आजादी,
    कीमत देनी पड़ती सबको
    फिर भी चाहें आजादी !
    bahut sudar bhavon se bhari par anita ji ham bhi yahi kahenge ki ham bhi chahe aazadi.

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  3. ऊपर का बंधन तो भ्रम है
    मन अदृश्य जाल में कैदी,

    सत्य-बात ||

    प्रभावशाली प्रस्तुति ||

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  4. मुक्ति का संदेश दे रहे
    खुले व्योम में उड़ते पंछी,
    मत बांधो पिंजर में मन को
    गा गा गीत सुनाते पंछी !

    बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ.

    सादर

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  5. जिसके लिये गगन भी कम है
    उसे कैद करते हो तन में,
    जो उन्मुक्त उड़ान चाहता
    कैसे वह सिमटेगा मन में !

    बहुत सशक्त रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. छोड़-छाड सब भाग गया जो
    सन्यासी जो मुक्त हुआ है,
    मन के हाथों बंधा है अब भी
    उसको केवल भ्रम हुआ है !

    शत-प्रतिशत सत्य है.....जहाँ हो वही रहते हुए ऊपर उठ जाना ही मुक्ति है .....बहुत सुन्दर शब्दों में सत्य कहा है आपने....

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  7. मुक्ति का संदेश दे रहे
    खुले व्योम में उड़ते पंछी,
    मत बांधो पिंजर में मन को
    गा गा गीत सुनाते पंछी !
    oj bharti rachna

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  8. पीड़ा यही, यही दुःख साले
    सारे बंधन तोड़ना चाहे,
    लेकिन होती भूल यहाँ है
    असली बंधन न पहचाने !
    bahut sundar bhavon se bhari aapki kavitayen man moh leti hain anita ji.badhai.

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  9. प्रभावपूर्ण रही है ये रचना..

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