रविवार, जुलाई 24

जुड़े मन, जुड़े नयन


सावन

पुलक उठी बादलों में
बूंद बन ढलक गयी,
ताप तप्त वसुंधरा
नीर पा संवर गयी !

दग्ध किया था हिया
पवन वह शरमा गयी,
रूप नया धर लेप
नेह का लगा गयी !

जी उठे तड़ाग, नद
कूप लबालब हुए,
पंछियों के बैन भी
मीत पा थम गए !

खिल उठे बहार बन
झुलस गए थे जो वन,
श्रावण की भेंट पा
जुड़े मन, जुड़े नयन !  



5 टिप्‍पणियां:

  1. जुड़ गए मन ..
    जुड़ गए नयन...
    मीठे बैन..
    टप-टप बुंदीयन करके श्रवण ...!!
    बहुत सुंदर रचना ..
    खिल गया मन पढ़ कर ....

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  2. श्रावण की भेंट पा
    जुड़े मन, जुड़े नयन !
    बहुत सुंदर रचना

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  3. स्वतन्त्रता दिवस की शुभ कामनाएँ।

    कल 16/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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