बुधवार, जुलाई 13

हम आनंद लोक के वासी

हम आनंद लोक के वासी


मन ही सीमा है मानव की
 पार है मन के खुला गगन,
 ले जाता है खाई में यह 
  ऊपर इससे  मुक्त पवन ! 

जो भी दंश है भीतर चुभता
जो भी हमें अभाव खल रहा,
जो भी पीड़ा हमें सताए
जो भी माँगे नहीं मिल रहा !

सब इसकी है कारगुजारी
मन है एक सधा व्यापारी,
इसके दांवपेंच जो समझे
पार हो गया वही खिलाड़ी !

हम आनंद लोक के वासी
यह हमको नीचे ले आता,
कभी दिखाता दिवास्वप्न यह
अपनी बातों में उलझाता ! 

सुख की आस बंधाता है मन
सुख आगे ही बढ़ता जाता,
थिर जो पल भर न रह सकता
कैसे उससे नर कुछ पाता !

घूम रहा हो चक्र सदा जो
कैसे बन सकता है आश्रय,
स्थिर, अचल एक सा प्रतिपल
वही स्रोत आनंद का सुखमय !

हम हैं एक ऊर्जा अविरत
स्वयं समर्थ, आप्तकाम हम,
मन छोटा सा ख्वाब दिखाए
डूब-डूब जाते उसमें हम !

स्वयं को भूल के पीड़ित होते
स्वयं की महिमा नहीं जानते,
सदा से हैं और सदा रहेंगे
भुला के यह हम रहे भागते !

मुक्ति तभी संभव है अपनी
मन के पार हुआ जब जाये
इससे जग को देखें चाहे,
यह न हममें जग भर पाए !


7 टिप्‍पणियां:

  1. मुक्ति तभी संभव है अपनी
    मन के पार हुआ जब जाये
    इससे जग को देखें चाहे,
    यह न हममें जग भर पाए
    bahut sundar v sarthak abhivyakti.badhai.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी रचना तेताला पर भी है ज़रा इधर भी नज़र घुमाइये
    http://tetalaa.blogspot.com/

    बहुत ही सुन्दर भाव

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  3. स्वयं को भूल के पीड़ित होते
    स्वयं की महिमा नहीं जानते,
    सदा से हैं और सदा रहेंगे
    भुला के यह हम रहे भागते !

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.आत्मस्वरुप का सुन्दर भान कराती हुई.
    आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर। किसी भी बात को कहने का आपका अंदाज बिल्कुल हटकर है। वाकई बहुत सुंदर ।

    घूम रहा हो चक्र सदा जो
    कैसे बन सकता है आश्रय,
    स्थिर, अचल एक सा प्रतिपल
    वही स्रोत आनंद का सुखमय !

    उत्तर देंहटाएं
  5. 'मन' के मत पे मत चलियो ये जीते जी मरवा देगा..........बहुत ही सुन्दर कविता है......

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