मंगलवार, जुलाई 12

उससे मिलन न क्योंकर होता

उससे मिलन न क्योंकर होता


पोर-पोर में श्वास-श्वास में
नस-नस में हर रक्त के कण में,
गहराई तक भीतर मन में
छाया जो पूरे जीवन में !

उससे ही हम अनजाने हैं
दूरी उससे बढ़ती जाती,
जो खुद से भी निकट है प्रियतम
उससे आँख नहीं मिल पाती !

जिसके होने से ही हम हैं
उससे मिलन न क्योंकर होता,
जिससे कण-कण व्याप रहा है
उससे न मन प्रीत जोड़ता !

मन अस्थिर, अस्थिर ही रहता
घबराया सा, रहे कांपता !
बन आकांक्षी यश मान का
या सुविधा के पीछे जाता !

बचा बचा कर रखता तन को
बचा बचा कर रखता धन को,
दोनों ही कुछ दिन के साथी
समझ न आता भोले मन को !




10 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों ही कुछ दिन के साथी
    समझ न आता भोले मन को !

    बहुत सही बात ..झकझोरती है मन को ....
    sunder abhivyakti ..

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  2. उससे ही हम अनजाने हैं
    दूरी उससे बढ़ती जाती,
    जो खुद से भी निकट है प्रियतम
    उससे आँख नहीं मिल पाती !

    बेहतरीन पंक्तियाँ हैं.

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. मन अस्थिर, अस्थिर ही रहता
    घबराया सा, रहे कांपता !
    बन आकांक्षी यश मान का
    या सुविधा के पीछे जाता !

    बचा बचा कर रखता तन को
    बचा बचा कर रखता धन को,
    दोनों ही कुछ दिन के साथी
    समझ न आता भोले मन को !

    बहुत ही सच और यतार्थ को दर्शाती ये पंक्तियाँ लाजवाब हैं |

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  4. उससे ही हम अनजाने हैं
    दूरी उससे बढ़ती जाती,
    जो खुद से भी निकट है प्रियतम
    उससे आँख नहीं मिल पाती !

    behtreen

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  5. जिसके होने से ही हम हैं
    उससे मिलन न क्योंकर होता,
    जिससे कण-कण व्याप रहा है
    उससे न मन प्रीत जोड़ता !

    बस यही तो समझ नहीं पाता आम इंसान ...अच्छी प्रस्तुति

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  6. गहन अभिव्यक्ति,खूबसूरत भावों के लिए बधाई

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  7. बचा बचा कर रखता तन को
    बचा बचा कर रखता धन को,
    दोनों ही कुछ दिन के साथी
    समझ न आता भोले मन को !

    ...गहन अहसास..सार्वभौमिक सत्य को उकेरती बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  8. जिसके होने से ही हम हैं
    उससे मिलन न क्योंकर होता,
    जिससे कण-कण व्याप रहा है
    उससे न मन प्रीत जोड़ता !


    सुंदर पंक्तियां...

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  9. बचा बचा कर रखता तन को
    बचा बचा कर रखता धन को,
    दोनों ही कुछ दिन के साथी
    समझ न आता भोले मन को !...सुंदर पंक्तियां...

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