मंगलवार, जुलाई 3

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी ब्लॉगर साथियों को ढेरों शुभकामनायें



खुद से भी तो मिलना सीखो


सद् गुरु कहते ‘हँसो हँसाओ’
खुद से भी तो मिलना सीखो,
जड़ के पीछे छिपा जो चेतन
उस प्रियतम को हर सूं देखो !

चलती फिरती है यह काया
चंचल मन इत् उत् दौड़ता,
भीतर उगते पुष्प मति के
चिदाकाश में वही कौंधता !

सत्य सदा एक सा रहता
था, है, होगा कभी न मिटता,
दृश्य बदलते पल-पल जग के
मधुर आत्मरस अविरल बहता !

दृष्टा बने जो बने साक्षी
निज आनंद महारस पाता,
राज एक झाँके उस दृग से
पूर्ण हुआ खुद में न समाता !


8 टिप्‍पणियां:

  1. अनंत शुभकामनाये अनीता जी....
    प्यारी रचना
    आभार.

    अनु

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  2. बहुत सुन्दर रचना..आभार अनीता जी..

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  3. सत्य सदा एक सा रहता
    था, है, होगा कभी न मिटता,
    दृश्य बदलते पल-पल जग के
    मधुर आत्मरस अविरल बहता !

    ...बहुत गहन और सार्थक प्रस्तुति...आभार

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  4. बिना गुरु के ज्ञान कहां से पावै!

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  5. अनु जी, माहेश्वरी जी, मनोज जी, कैलाश जी, व संगीता जी आप सभी का स्वागत....आभार !

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  6. आपकी रचनायें दिव्य प्रकाश लिये होती हैं ...!!
    गुरु कृपा है ...आप पर ...!!

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