रविवार, जुलाई 8

ओह ! फिर बिजली चली गयी


ओह ! फिर बिजली चली गयी

गूंज रही मधु सम इक कूक
भोर सुहानी, तपती धूप,
जाने किस मस्ती में ड़ूबे
नन्हें शावक, सुंदर रूप !

बिजली-बिजली करता मानव
वे तपती दोपहर में गाते,
सर्दी, गर्मी, हो बहार या
सारे मौसम इनको भाते !

अभी जुड़े हैं शायद उससे
हम बिछड़े हैं जाने कब से,
भीतर कोई स्रोत खो गया
कितना दुर्बल मनुज हो गया !

किस-किस का यह हुआ गुलाम
रहा नहीं मेहनत के काम,
कैसे उसे नचाता है मन
पल-पल करता उसे सलाम !

सादा जीवन, हल्का सा मन
देह भी फूल सी महक उठेगी,
भीतर छिपी आत्मज्योति जो
कण-कण से फिर स्वयं झलकेगी !

9 टिप्‍पणियां:

  1. आरामतलब हो चुका आदमी अब सुविधाओं का गुलाम हो चला है...

    सुन्दर भाव..

    अनु

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  2. सादा जीवन, हल्का सा मन
    देह भी फूल सी महक उठेगी,
    भीतर छिपी आत्मज्योति जो
    कण-कण से फिर स्वयं झलकेगी !..............सार्थक सोच की अभिव्यक्ति

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  3. आज मानव विज्ञान का दास हो गया है .... बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  4. हम यांत्रिक जीवन के आदी हो गए हैं। प्रकृति के सान्निध्य में जो आनंद है वह इन यंत्रों में कहां।

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  5. सोभाग्य वश हमे बिजली चली गयी नहीं कहना परता.....

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  6. अहा! गहन बात कह दिया है बड़ी सुन्दरता से..

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  7. सचमुच सुविधाओ का आदी हो गया है इन्सान... सार्थक अभिव्यक्ति... आभार

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  8. बहुत ही सुन्दरता से आपने निर्भरता का बखान किया है.....सुन्दर ।

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  9. अधिक सुविधाओ के हम गुलाम होगए . सार्थक अभिव्यक्ति...

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