बुधवार, जनवरी 16

मुक्त गगन सा गीत गा सके



मुक्त गगन सा गीत गा सके

‘सावधान’ का बोर्ड लगाये
हर कोई बैठा है घर में,
मिलना फिर कैसे सम्भव हो
लौट गया वह तो बाहर से !

या फिर चौकीदार है बुद्धि
साहब से मिलने न देती,
ऊसर ऊसर ही रह जाता
अंतर को खिलने न देती !

प्राणों का सहयोग चाहिए
भीतर वह प्रवेश पा सके,
सत्य को जो भी पाना चाहे
मुक्त गगन सा गीत गा सके !

प्रकृति अपने गहन मौन में
निशदिन उसकी खबर दे रही,
सूक्ष्म इशारे करे विपिन भी 
गुपचुप वन की डगर कह रही ! 

पल में नभ पर बादल छाते
गरज-गरज कर कुछ कह जाते
पानी का बौछारें भी तो
पाकर कितने मन खिल जाते !

जो भी कुछ जग दे सकता है
शब्दों में ही घटता है वह,
लेकिन सच है पार शब्द के
जो निशब्द में ही मिलता है !

  

17 टिप्‍पणियां:

  1. जो भी कुछ जग दे सकता है
    शब्दों में ही घटता है वह,
    लेकिन सच है पार शब्द के
    जो निशब्द में ही मिलता है !

    ....बहुत सुन्दर और गहन अभिव्यक्ति..आभार

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  2. वाह वाह.....बहुत ही सुन्दर......शुरू के दो पैरे दो लाजवाब हैं ।

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  3. मानसिक कुहांसे और हमारे मनो सामाजिक,दफ्तरी परिवेश का खूब सूरत खुलासा हुआ है इस रचना में .

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    1. वीरू भाई, हमारा मन भी तो दफ्तर से कम नहीं..

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  4. या फिर चौकीदार है बुद्धि
    साहब से मिलने न देती,
    ऊसर ऊसर ही रह जाता
    अंतर को खिलने न देती !

    जो भी कुछ जग दे सकता है
    शब्दों में ही घटता है वह,
    लेकिन सच है पार शब्द के
    जो निशब्द में ही मिलता है !

    बहुत सुन्दर...
    पूरी रचना ही अपने आप में सुन्दर भाव से परिपूर्ण है....!
    बधाई....एवं....धन्यवाद एकसाथ...!

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  5. प्राणों का सहयोग चाहिए
    भीतर वह प्रवेश पा सके,
    सत्य को जो भी पाना चाहे
    मुक्त गगन सा गीत गा सके !

    बहुत सुंदर भाव ।

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  6. वाह ... क्‍या बा‍त है बहुत ही बढिया।

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  7. महेश्वरी जी, सदा जी, संगीता जी व सिंह जी अप सभी का स्वागत व् आभार !

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  8. एकदम मेरे ह्रदय के भावों को शब्द दे दिया है ..

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    1. तब तो बात पक्की हो गयी कि परम प्रेम में दिल एक से धड़कते हैं..

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