बुधवार, जनवरी 9

स्वयं में भी जीवन उगता है


स्वयं में भी जीवन उगता है


सबको खुश करते करते ही
हँसना हम स्वयं भूल गए,  
सबको अपने पास किया था
खुद से ही दूर निकल गए !

भय ही एक सूत्र में बांधे
प्रेम कहाँ दीखे जग में,
मिले अभय जब थामें खुद को
फूल झरा करते मग में !

जो स्वभाव में टिकना सीखे
वही खुशी को पा सकता है,
जिसने खुद को पाया खुद में
वही खुदा तक जा सकता है !

नजर हटे जब अन्यों से तो
स्वयं में भी जीवन उगता है,
भीतर एक उजाला भरता
निर्झर कोई झर-झरता है !

क़ुरबानी के नाम पे अक्सर
दर्द दिया खुद को हमने,
इसी दर्द को बांटा जग में
फिर क्यों उठे शिकायत मन में !

जो आनंद से भर जाता है
वही सुगंध बिखेरे जग में,
वही वृक्ष छाया दे सकता
जो भर जाता है खुद में !

पहले खुद को प्रेम से भर लें
शेष सहज ही सब घटता है,
न भीतर कुछ हानि होती
बल्कि हर सुख बढता है !


16 टिप्‍पणियां:

  1. सबको खुश करते करते ही
    हँसना हम स्वयं भूल गए,
    सबको अपने पास किया था
    खुद से ही दूर निकल गए !
    mai swyam se judi manti hu in panktiyon ko

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. संध्या जी, इन पंक्तियों को आप स्वयं से जोड़ पाती हैं, अच्छा लगा यह जानकर, आपका स्वागत है,आभार!

      हटाएं
  2. जो आनंद से भर जाता है
    वही सुगंध बिखेरे जग में,
    वही वृक्ष छाया दे सकता
    जो भर जाता है खुद में !
    बहुत सुन्दर भाव... आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. क़ुरबानी के नाम पे अक्सर
    दर्द दिया खुद को हमने,
    इसी दर्द को बांटा जग में
    फिर क्यों उठे शिकायत मन में !

    बहुत बहुत सुन्दर ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. जो स्वभाव में टिकना सीखे
    वही खुशी को पा सकता है,
    जिसने खुद को पाया खुद में
    वही खुदा तक जा सकता है !

    बहुत सुंदर और गहन विचार ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत खूबसूरत भाव!
    पहले खुद को टोह लें, पा लें... तो सारे द्वार खुद-ब-खुद जाएँगे!
    (एक बात पूछना चाहेंगे अनिता जी ...- ' ये फूल (चित्र में) क्या 'कौरव-पांडव' है ?' (पहले हमारे घर में लगा था, हमें बहुत पसंद था! इसी से पूछा...) :-)
    ~सादर!!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. मीता, मैंने भी सुना तो है कुछ ऐसा ही नाम वैसे इसे पैशन फ्लावर भी कहते हैं शायद..

      हटाएं
  6. अहा ! कितनी सुन्दर बातें हैं ..सही में हम खुद को भूल जाते हैं..

    उत्तर देंहटाएं