मंगलवार, मार्च 19

ठिठक गयी कोयल की कूक



ठिठक गयी कोयल की कूक


मुरझाई सी आम्र मंजरी
ठिठक गयी कोयल की कूक,
जाने कौन निगोड़ी आकर
गई कान में उसके फूँक !

कैसे घोलें रंग अनूठे
भीगा-भीगा सा मौसम है,
पिचकारी भी सहमी सी है
गुब्बारों पर बैन लगा है  !

नफरत के कुछ रंग डालते
कुछ दहशत आतंक बांटते,
कुछ को दौलत रंगी लगती
ताकत, सत्ता, रक्त मांगते !

ऐसे में क्या होगा फाग
लगी हुई है द्वेष की आग,
शायद होली उसे बुझाये
सोये हैं जो जाएँ जाग !

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 20/03/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. सुन्दर भाव....
    समय रहते चेत गए तो अच्छा....

    सादर
    अनु

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  3. जी होली के रंग इस द्वेष और नफरत को धो डालें इसी आशा में ।

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  4. नफरत के कुछ रंग डालते
    कुछ दहशत आतंक बांटते,
    कुछ को दौलत रंगी लगती
    ताकत, सत्ता, रक्त मांगते !बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
    latest post सद्वुद्धि और सद्भावना का प्रसार
    latest postऋण उतार!

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  5. समय रहते जागना तो होगा ही!
    बहुत सार्थक ,अनिता जी....

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (20-03-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
    सूचनार्थ |

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  7. द्वेष की आग बुझनी चाहिए ...सुंदर कविता

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  8. अति सुन्दर! मेरी बधाई स्वीकार करें।

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  9. निहार जी, यशोदा जी, महेश्वरी जी, इमरान, प्रदीप जी, रजनीश जी, ब्रिजेश जी, अदिति जी, तथा कालीपद जी आप सभी का स्वागत व आभार ! होली की अग्रिम शुभकामनायें !

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  10. ऐसे में क्या होगा फाग
    लगी हुई है द्वेष की आग,
    शायद होली उसे बुझाये
    सोये हैं जो जाएँ जाग !

    .....सच में अगर आज नहीं जागे तो शायद फिर समय न मिले..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..आभार

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    1. कैलाश जी, सही कहा है आपने..जागने का वक्त आ गया है, आभार!

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