शनिवार, मार्च 2

अपना-अपना स्वप्न देखते


अपना-अपना स्वप्न देखते


एक चक्र है सारा जीवन
जन्म-मरण पर अवलंबित,
एक ऊर्जा अविरत बहती
हुई कभी न जो खंडित !

एक बिंदु से शुरू हुआ था
वहीं लौट कर आता है,
किन्तु पुनः नया जीवन
नए कलेवर में आता है !

पंछी, मौसम जीव सभी तो
इसी चक्र से बंधे हुए,
अपना-अपना स्वप्न देखते
नयन सभी के मुंदे हुए !

हुई शाम तो कहीं अजान
कहीं मंत्र, सुवासित धूप,
कहीं आरती, वन्दन अर्चन
कहीं सजा है सुंदर रूप !

एक दिवस अब खो जायेगा
समा काल के भीषण मुख में,
कभी लौट कर न आयेगा
बीता चाहे सुख में दुःख में !

एक रात्रि होगी अन्तिम
तन का दीपक बुझा जा रहा,
यही गगन तब भी तो होगा
 पल-पल करते समय जा रहा !

7 टिप्‍पणियां:

  1. आभार आदरेया -
    सुन्दर प्रस्तुति ||

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  2. चलती जीवन यात्रा ...अनवरत ...
    सुंदर रचना ....!!

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  3. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति

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  4. एक रात्रि होगी अन्तिम
    तन का दीपक बुझा जा रहा,
    यही गगन तब भी तो होगा
    पल-पल करते समय जा रहा !
    ..... जीवन के सापेक्ष में एक भावपूर्ण रचना!

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  5. एक बिंदु से शुरू हुआ था
    वहीं लौट कर आता है,
    किन्तु पुनः नया जीवन
    नए कलेवर में आता है !

    ....यह जीवन चक्र यूँ ही अनवरत चलता रहता है...बहुत सुन्दर ...आभार

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  6. एक रात्रि होगी अन्तिम
    तन का दीपक बुझा जा रहा,
    यही गगन तब भी तो होगा
    पल-पल करते समय जा रहा!

    जीवन की सच्चाई अंत में यही है.

    सुंदर गीत, सुंदर प्रस्तुति.

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  7. रविकर जी, रचना जी, कैलाश जी, वन्दना जी, शालिनी जी व अनुपमा जी, आप सभी का स्वागत व आभार !

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