मंगलवार, नवंबर 18

हरियाली का गांव अनोखा

हरियाली का गांव अनोखा



खिले गुलाब, मालती, बेला, फुदक रहा खगों का मेला
रह-रह गूंजे कलरव मद्धम, कहीं भ्रमर का अविरत सरगम I

हरियाली का गांव अनोखा
अंतरिक्ष में नील झरोखा
गौरेया उड़ आती ऐसे
शीतल कोई हवा का झोंका

आड़े-तिरछे डाल वृक्ष के, झुरमुट कहीं दीर्घ बांस के
हल्की-हल्की तपन पवन में, छुपा सूर्य घन पीछे नभ में 

अनगिन फूल हजारों वर्ण
भांति-भांति के धारे पर्ण
अमलतास का पीतवर्ण लख
रक्तिम स्वाद गुलमोहर का चख

प्रकृति मोहक भरी दोपहरी, सुंदरता हर सूं है बिखरी
रह-रह मौन टूटता प्रहरी, गूंज उठे कोई स्वर लहरी 

नन्हा सा एक नील पुष्प भी
कह जाता सब मौन खड़ा सा
पोखर से उगती कुमुदिनी
या फिर कोई कमल बड़ा सा

गोल, नुकीले, सूक्ष्म, कंटीले, धानी, हरे, बैंगनी, पीले
जाने कितने आकारों में, पत्र वृक्ष के ह्ज्जारों में 

कोमल स्पर्श कभी तीक्ष्ण भी
शीतल मौसम कभी उष्ण भी
प्रकृति का भंडार अपरिमित
अनंत वहाँ सब, कुछ न सीमित

लुटा रहा दोनों हाथों से, दूर कहीं से कोषाध्यक्ष
नहीं खत्म होने को आता, पुरुष छुपा प्रकृति प्रत्यक्ष 

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. मनोरम प्रकृति के चित्र - रहस्यवाद के पुट सहित !

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  3. कल 20/नवंबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  4. अहा ...रचना मन में भी हरियाली भर रही है. सुन्दर कृति.

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  5. प्रतिभा जी, आकांक्षा जी व निहार जी, आप सभी का का स्वागत व आभार !

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  6. मनोरम चित्र के साथ हरी भरी रचना !

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