सोमवार, जुलाई 20

भीतर दीपक एक जला है

भीतर दीपक एक जला है 


बना रहे जागरण ह्रदय में 

धरा-गगन पावन बन जाते, 

दें दृष्टि सम्मान की भीतर 

ख़ुद ही सम्मुख नव पथ आते ! 


ध्यान जहाँ भी जाकर टिकता 

ऊर्जा उधर प्रवाहित होती,

धैर्य-शांति के संग रह प्रज्ञा 

 ऊर्जा स्रोत सहज पा लेती !


श्वासों के पुल पर ही मन का 

राही आगे बढ़ता जाता, 

 शक्ति से पूरित हुईं श्वासें 

भीतर रस्ता खुलता जाता 


देह एक देवालय जिसमें 

श्वास एक अर्चन सी चलती, 

भीतर दीपक एक जला है 

उस अनाम की पूजा होती ! 


श्वासें हैं वे तार अनोखे 

जो पूर्ण ब्रह्मांड को जोड़ें 

गूँज रहा अस्तित्त्व निरंतर

  श्वासों को सजग हुए छोड़ें !

 

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर आध्यात्मिक भावाभिव्यक्ति ।

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  2. देह एक देवालय जिसमें

    श्वास एक अर्चन सी चलती,

    भीतर दीपक एक जला है

    उस अनाम की पूजा होती
    अपने भीतर के स्वभाव में स्थित रहना ही अध्यात्म है। बहुत सुंदर और प्रेरक रचना।

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