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गुरुवार, सितंबर 11

हर पल जीवन नया हो रहा

हर पल जीवन नया हो रहा 


साथ समय के चलना होगा

वरना ख़ुद को छलना होगा, 

शब्द उगें पन्ने पर, पहले

मन को भीतर गलना होगा!


छंद, ताल, लय, बिंब अनोखा 

हर युग में नव रचना होगा, 

ओढ़ पुरानी चादर कब तक 

इतिहासों को तकना होगा!


हर पल जीवन नया हो रहा 

नूतन ढब से सजना होगा, 

परिपाटी का रोना रोते 

आदर्शों से बचना होगा!


सच को सच औ' झूठ-झूठ को 

कहना,लिखना,पढ़ना होगा। 

कब तक आख़िर कर समझौते 

राग पुराना रटना  होगा!


रविवार, जून 4

नयनों में नित नव साध रहे

नयनों में नित नव साध रहे


मृदु छंद बहा, मकरंद बहा 

जब वे अनजाने हाथ गहे,

जीवन में शुभ सन्तोष जगा 

नयनों में नित नव साध रहे !


लय, ताल, सुगम सध जाते सुर 

जब अनदेखे नाते जुड़ते, 

पंछी, पादप, चाँद,  सूर्य  से 

नेह भरे संदेशे मिलते !


जिसके तट पर मानस ठहरे 

सरिता अंतर में उग आती, 

जन्मों की तृप्ति कराये जो 

अजस्र धारा बहती जाती !


गंध धरा से, रंग गगन से 

सरसिज खिला पंक में कोमल, 

जल से जुड़ी मूल नभ से तन 

पवन झुलाता अम्बुज  श्यामल !


अंतर्कमल  चेतना का जब 

महासरोवर में खिलता है, 

प्रकृति माँ की भरे सुवास उर 

जग से पुलकित हो मिलता है !


मंगलवार, जुलाई 26

महाकाल सँग इक हो जाएँ

महाकाल सँग इक हो जाएँ 


लय खोयी छूटा छंद आज 

जीवन में छाया महा द्वंद्व, 

कविता सोयी भाव अनमने 

कहाँ खो गया मधुर मकरंद !


समय पखेरू उड़ता जाता 

काल चक्र अनवरत चल रहा, 

आयु पोटली से रिस घटती  

बढ़ती कह नर स्वयं छल रहा !


भूल ग़या दिल जिन बातों को 

उन पर अब क्यों वक़्त बहाएँ, 

मन थम जाए समय थमेगा 

महाकाल सँग इक हो जाएँ !


गुरुवार, अप्रैल 7

उर तोड़े हर बंधन

उर तोड़े हर बंधन

जीवन में छंद बहे 

मन में मकरंद गहें, 

रस धार झरे अविरत 

कान्हा यदुनंद कहें !

 

श्वासों में सुमिरन हो 

नयनों से हो वंदन, 

स्पंदित हों प्राण सदा 

उर तोड़े हर बंधन !

 

जो दिखता इक भ्रम है 

मिथ्या में क्या श्रम है, 

दुर्गम है सच का पथ 

मर कर मिटता क्रम है !

 

मरता भी कौन भला 

पहले ही जो मृत है, 

मिटकर भी शेष रहे 

निजता ही शाश्वत है !


मंगलवार, अप्रैल 16

नव गीत नव छंद सुनाये


 नव गीत नव छंद सुनाये

सहज प्रेम जीवन में आये, कैसी उलटफेर कर जाये

जो भी सच लगता था पहले
स्वप्न सरीखा उसे बनाता
छुपा हुआ भीतर जो सुख है
खोल आवरण बाहर लाता

जैसे कोई दुल्हन घूंघट, आहिस्ता से रही उठाये 

कुछ होने का जो भ्रम पाला
शून्य बनाकर उसे मिटाता
पत्थर सम जो अंतर्मन था
बना मोम उसको पिघलाता

कैसे अद्भुत खेल रचाए, उथलपुथल जीवन में आये

हर पल नया नया सा दर्शन
अद्भुत है उस रब का वर्तन
हरि अनंत हरि कथा अनन्ता
यूँ ही संत नहीं रहे गाये

नित नूतन वह परम प्रेम है, पल पल नया-नया सच लाए

ऊपर से दिखता है जो भी
भीतर कितने भेद समोए 
जैसे कोई कुशल चितेरा
छुपा हुआ नव रंग भिगोये

या फिर नर्तक एक अनूठा, हर क्षण नयी मुद्रा दिखलाये

भीतर कोई है, मार्ग दो
बाहर आने को अकुलाता
फूट रहा जो रक्त गुलाल
उत्सुक तुम्हें लगाना चाहता

अहो ! सुनो यह स्वर सृष्टि के, नव गीत नव छंद सुनाये