महाकाल सँग इक हो जाएँ
लय खोयी छूटा छंद आज
जीवन में छाया महा द्वंद्व,
कविता सोयी भाव अनमने
कहाँ खो गया मधुर मकरंद !
समय पखेरू उड़ता जाता
काल चक्र अनवरत चल रहा,
आयु पोटली से रिस घटती
बढ़ती कह नर स्वयं छल रहा !
भूल ग़या दिल जिन बातों को
उन पर अब क्यों वक़्त बहाएँ,
मन थम जाए समय थमेगा
महाकाल सँग इक हो जाएँ !
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