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मंगलवार, जुलाई 26

महाकाल सँग इक हो जाएँ

महाकाल सँग इक हो जाएँ 


लय खोयी छूटा छंद आज 

जीवन में छाया महा द्वंद्व, 

कविता सोयी भाव अनमने 

कहाँ खो गया मधुर मकरंद !


समय पखेरू उड़ता जाता 

काल चक्र अनवरत चल रहा, 

आयु पोटली से रिस घटती  

बढ़ती कह नर स्वयं छल रहा !


भूल ग़या दिल जिन बातों को 

उन पर अब क्यों वक़्त बहाएँ, 

मन थम जाए समय थमेगा 

महाकाल सँग इक हो जाएँ !


रविवार, अप्रैल 12

अमर आत्मा का सुगीत फिर


अमर आत्मा का सुगीत फिर 


हम अनुशासन पर्व मनाएं 
भारत की अस्मिता बचाएं,
अमर आत्मा का सुगीत फिर 
मिलकर गोविन्द संग गायें !

मृत्यु से नहीं डरे भारती 
गीत प्रलय के नित्य सुनाएँ,
आज उसी गौरव गाथा को 
निज शक्ति से फिर दोहराएं !

युग परिवर्तन का चले यज्ञ  
दे आहुति कर्त्तव्य निभाएं, 
बार-बार इस भू पर लौटें 
मात प्रकृति को शीश झुकाएँ  !

आयु दीर्घ हो यही न माँगें 
भीतर गहरा बोध जगाएं, 
आत्मशक्ति का करें जागरण 
घर-घर दीपक योग जलाएं !

अनुशासन का पालन करके 
दुनिया को नव मार्ग सुझाएँ, 
भारत की संस्कृति अपूर्व है 
इस सच को जीकर दिखलाएँ !