देखो ! कोई ताक रहा है
सम्मुख आने से घबराए
आहट भर से झट छुप जाए,
उर के भीतर से ही देखे
चुपके-चुपके झांक रहा है !
देखो ! कोई ताक रहा है
पर्दे के पीछे वह रहता
सारी नादानी को सहता,
पल-पल छिन-छिन गुपचुप निशदिन
चलता उसका चाक रहा है !
देखो ! कोई ताक रहा है
लुका छिपी का खेल चल रहा
यूँ हर पल ही मेल हो रहा,
दर्पण यह मन बन ना जाए
तब तक जीवन खाक रहा है !
देखो ! कोई ताक रहा है
दृश्य वही द्रष्टा भी वह है
फिर भी पटल मध्य में डाला,
कैसा खेल रचाया माधव
अनुपम, अद्भुत आंक रहा है !
देखो ! कोई ताक रहा है
प्रेम धार जब दिल में बहती
तब सारे पर्दे गिर जाते,
प्रकट हुआ वह छिप न सके तब
प्रेमी-प्रियतम आप रहा है !
देखो ! कोई ताक रहा है
जब प्रियतम भी खो जाता है
शेष प्रेम ही प्रेम रहे उर,
न प्याला न मधु ही बचता, बस
मदहोशी का आक रहा है !
देखो ! कोई ताक रहा है
