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शुक्रवार, फ़रवरी 24

देखो कोई ताक रहा है


देखो  ! कोई ताक रहा है


सम्मुख आने से घबराए

आहट भर से झट छुप जाए,

उर के भीतर से ही देखे

चुपके-चुपके झांक रहा है !


देखो  ! कोई ताक रहा है


पर्दे के पीछे वह रहता

सारी नादानी को सहता,

पल-पल छिन-छिन गुपचुप निशदिन

चलता उसका चाक रहा है !


देखो  ! कोई ताक रहा है


लुका छिपी का खेल चल रहा

यूँ हर पल ही मेल हो रहा,

दर्पण यह मन बन ना जाए 

तब तक जीवन खाक रहा है !


देखो  ! कोई ताक रहा है


दृश्य वही द्रष्टा भी वह है

फिर भी पटल  मध्य में डाला,

कैसा खेल रचाया माधव

अनुपम, अद्भुत आंक रहा है !


देखो  ! कोई ताक रहा है

 

प्रेम धार जब दिल में बहती

तब सारे पर्दे गिर जाते,

प्रकट हुआ वह छिप न सके तब

प्रेमी-प्रियतम आप रहा है !


देखो ! कोई ताक रहा है


जब प्रियतम भी खो जाता है

शेष प्रेम ही प्रेम रहे उर, 

न प्याला न मधु ही बचता, बस 

मदहोशी का आक रहा है !

 

देखो  ! कोई ताक रहा है