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शुक्रवार, जुलाई 25

गूँज किसी निर्दोष हँसी की

गूँज किसी निर्दोष हँसी की 


खन-खन करती पायलिया सी 

मधुर रुनझुनी घुँघरू वाली, 

खिल-खिल करती हँसी बिखरती 

ज्यों अंबर से वर्षा होती !

 

अंतर से फूटे ज्यों झरना 

अधरों से बिखरे ज्यों नगमा,

कानों को भी भरे हर्ष से 

अंतर को भी गुदगुद करती !

 

गूँज किसी निर्दोष हँसी की 

याद बनी इक  दिल में बसती,

कभी भिगोती आँखें बरबस 

कभी हृदय को भी नम करती !


बुधवार, मार्च 28

एक नगमा जिन्दगी का


एक नगमा जिन्दगी का


एक दरिया या समन्दर
बह रहा जो प्रीत बनकर,
बाँध मत बाँधें तटों पर
उमग जाये छलछलाकर !

एक प्यारी सी हँसी भी
कैद है जो कन्दरा में,
कसमसाती खुदबुदाती
बिखर जाएगी जहाँ में !

एक नगमा जिन्दगी का
शायराना इक फसाना,
दिलोबगिया में दबा जो
बीज महके बन तराना !

एक जागी रात आये
ख्वाब नयनों में सजाये,
दूर से आती सदा को
ला निकट कुहु गीत गाये !

एक नर्तन आत्मा का
ढोल की थापें अनूठी,
बाल दे अनुपम उजाला
बाँसुरी, वीणा की ज्योति