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सोमवार, अक्टूबर 7

असली नवरात्रि

असली नवरात्रि 


कामना जगी तो

 धुआँ-धुआँ कर देती है भीतर 

अग्नि आत्मा की बुझ जाती है 

बुझती नहीं तो छुप जाती है !


हर चाह मन के दर्पण पर 

चिपक जाती है 

धूल की परत बन कर 

झलक आत्मा की खो जाती है 

खोती नहीं तो ढक जाती है !


आत्मा का सूरज जहाँ चमकता है 

वहाँ पारदर्शी होता है मन 

अग्नि प्रज्ज्वलित होती है 

पूरे वैभव में 

इच्छा की सुलगती लकड़ियाँ 

कोई धुआँ नहीं देती 

सारे बीज सुख गये होते हैं संस्कारों के 

जो तड़-तड़ कर जलते हैं !


देदीपम्यान होता है भीतर का आकाश 

और यही लक्ष्य है हर मानव का 

फिर भी ख़ुद को भरमाते हैं 

लड़ते और लड़वाते हैं 

माँ को सौंप दें सारी आकांक्षाएँ 

असली नवरात्रि तभी तो मनेगी 

दिल की बगिया 

फिर-फिर खिलेगी !  


मंगलवार, अक्टूबर 17

अबकी बार नवरात्रों में

अबकी बार नवरात्रों में 


तंद्रा, प्रमाद सताते हैं 

देह को अथवा मन को  

आत्मा सदा ही सचेतन है !

पर जैसे काली हो जाये चिमनी

 तो प्रकाश नहीं आता 

प्रमादी हो जाये देह या मन तो 

आनंद आत्मा का बाहर नहीं आता !

देह-दीपक जब साफ़ नहीं रहता 

तो मन-स्नेह कैसे भरा जाएगा उसमें 

देह दीपक में स्नेहिल मन हो 

तभी न आत्मा की ज्योति जगमगायेगी 

और देख वह जोत, अबकी बार 

नवरात्रों में माँ हमारे घर आएगी 

योग से देह-दीपक सजाना है 

ध्यान से मन-स्नेह जलाना है 

तब प्रकटेगी वह अखंड ज्योति 

जो अभी सोयी है 

अंधकार में भटक रोयी है !


गुरुवार, अक्टूबर 12

नवरात्रि का करें स्वागत

नवरात्रि का करें स्वागत 


बस दो दिनों की प्रतीक्षा 

फिर देवी का आगमन होगा 

गरबे की धूम मचेगी 

घरों में कलश स्थापन होगा 

मिलजुल कर उत्सव मनाना 

भारत की संस्कृति है 

इन दिनों पूरा वैभव लुटाती प्रकृति है 

हरसिंगार के फूल भोर में झरते हैं 

सारे आलम को दैवीय सुगंध से भरते हैं 

संग मखाने की खीर, कोटू की रोटी 

व साबूदाने की खिचड़ी की महक 

सुबह शाम धूप, अगर बत्ती 

मन्दिरों में अखंड दीपक !

व्रत, उपवास, जप, ध्यान 

दुर्गा सप्तशती का पारायण भी 

कुछ दिनों के लिए 

सोशल मीडिया से पलायन भी !

माँ के आने से खिला-खिला है धरा का मन 

राम लौटेंगे, मनेगा विजयादशमी का दिन !

है शरद का आकाश भी कितना निर्मल 

फैलता हर तरफ़ श्रद्धा का भाव अमल 

नृत्य, संगीत और कलाओं का सृजन करें 

मिलकर भजन और एकांत में मनन करें 

आत्मशक्ति को जगायें हम, माँ बताना चाहे 

उसकी शक्ति है सदा साथ, यह जताना चाहे ! 


शुक्रवार, जुलाई 7

शरद की एक शाम

शरद की एक शाम


भीगी-भीगी दूब ओस से

हरीतिमा जिसकी मनभाती,

शेफाली की मोहक सुवास

झींगुर गान संग तिर आती !


शरद काल का नीरव नभ है

रिक्त मेघ से, दर्पण जैसा,

दमक रहा संध्या का तारा

चन्द्र बना सौंदर्य गगन का !


हल्की हल्की ठंडक प्यारी

सन्नाटे को सघन बनाती,

पेड़ों, पौधों की छायाएं

उपवन रहस्यमयी बनातीं !


नन्हें नन्हें कुछ कीट दूब में

श्वेत पतंगे ज्योति खोजते,

नवरात्रि पूजा के मंत्र स्वर

छन के आते मंदिर पट से !


एक और आवाज गूंजती

नीरवता को भंग कर रही,

बिजली चली गयी लगती है

जेनरेटर की धुन बज रही !


शुक्रवार, सितंबर 26

देवी का आगमन सुंदर

देवी का आगमन सुंदर



आश्विन शुक्ला नवरात्रि का
उत्सव अद्भुत कालरात्रि का
देवी दुर्गा महामाया का
राज राजेश्वरी, जगदम्बा का I

कल्याणी, निर्गुणा, भवानी
अखिल विश्व आश्रयीदात्री
वसुंधरा, भूदेवी, जननी
धी, श्री, काँति, क्षमा, स्मृति I

श्रद्धा, मेधा, धृति तुम्हीं हो
माता गौरी, दुःख निवारिणी
जया, विजया, धात्री, लज्जा
कीर्ति, स्पृहा, दया कारिणी I

चिन्मयी देवी पराम्बा तुम
उमा, पार्वती, सती, भवानी
ब्रह्मचारिणी, ब्रह्मस्वरूपिणी
सावित्री, शाकम्बरी देवी I

काली माँ, कपालिने अम्बा
स्वाहा तुम स्वधा कहलाती
विश्वेश्वरी, आनन्ददायिनी
शांतिस्वरूपा, आद्याशक्ति I

त्रिगुणमयी, करुणामयी, कमला
चण्डिका, शाम्भवी, सुभद्रा
हे भुवनेश्वरी, माता गिरिजा
मंगल दात्री, हे जगदम्बा!  

सिंह वाहिनी, माँ कात्यायनी
चंद्रघंटा, कुष्मांडा देवी
अष्टभुजा, स्वर्णमयी माँ
त्रिनेत्री तुम सिद्धि दात्री I

इच्छा, कर्म, ज्ञान की शक्ति
अन्नपूर्णा, इड़ा, विशालाक्षी
कोटिसूर्य सम काँति धारिणी
क्षेमंकरी, माँ शैलवासिनी  I

गूंजे घंटनाद व निनाद
नाश किये मुंड और चंड
कुंडलिनी स्वरूपा माता
महिषासुरमर्दिनी प्रचंड  I

शक्ति बिना हैं शिव अधूरे
सृष्टि के कार्य नहीं पूरे
ज्योतिर्मयी, जगतव्यापिनी
सजे मार्ग, मंदिर कंगूरे I

देवी का आगमन सुंदर
उतना ही  भव्य प्रतिगमन
जगह जगह पंडाल सजे हैं
करते बाल, युवा सब नर्तन I

  

      





मंगलवार, अक्टूबर 4

दुलियाजान में दुर्गापूजा



माँ तेरे रूप अनेक

जगज्जननी ! हे मूल प्रकृति !
ज्योतिस्वरूपा सनातनी,
जगदम्बा, माँ सरस्वती
लक्ष्मी, गंगा, पार्वती !

दुर्गा देवी सदा सहाय
जीवन में बाधा जब आए,
भद्र काली करे कल्याण
माँ अम्बिका स्नेह लुटाए !

अन्नपूर्णा भरे भंडारे
सर्वमंगला मंगल लाए,  
चण्डिका परम शक्ति
भैरवी भय हरले जाय ! 

आनंद दायिनी ललिता देवी
जीवन दात्री है भवानी,
मुकाम्बिका माँ त्रिपुर सुन्दरी
कुमुदा, कुंडलिनी, रुद्राणी !