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गुरुवार, सितंबर 28

रहे साधते वीणा के स्वर


रहे साधते वीणा के स्वर
कितनी बार झुकें आखिर हम 
कितनी बार पढ़ें ये आखर,
जीवन सारा यूँ ही बीता 
रहे साधते वीणा के स्वर !

श्वास काँपती ह्रदय डोलता 
हौले-हौले सुधियाँ आतीं,
कितनी बार कदम लौटे थे 
रह-रह वे यादें धड़कातीं !

निज पैरों का लेकर सम्बल
इक ना इक दिन चढ़ना होगा,
छोड़ आश्रय जगत के मोहक 
सूने पथ पर बढ़ना होगा !

कितने जन्म सोचते बीते 
जल को मथते रहे बावरे,
कब तक स्वप्न देख समझाएँ 
कब तक रस्ता तकें सांवरे ! 

बुधवार, जनवरी 31

लहर उठी


लहर उठी

सहज तरंगित उच्छल ऊर्जित
लहर उठी विराट सागर में,
लक्ष्य नहीं है कोई जिसका
गिर जाती विलीन हो पल में !

छूता कोई दृश्य गगन का
कभी धरा हँसती अंतर में,
निज सृष्टि शुभा देख-देख ही
मुग्ध हो रहा कोई जग में !

कर वीणा तारों को झंकृत
हर्षित हो निनाद उपजाता,
सहज जगे जब पग में नर्तन
उर के भावों को दर्शाता !

 एक सत्य ही प्रकटे सब में
भाव जगें अंतर में ऐसे,
सहज ऊर्जा रवि बिखराता
 कृत्य झरें ऐसे ही जग में !

मंगलवार, मार्च 18

कौन है वह


कौन है वह



दिल की गहराई जो जाने
उसके सम्मुख ही दिल खोलें

जन्मों का जो मीत पुराना
मन की बात उसे ही बोलें

दूर तलक जो साथ चलेगा
पथ में उसके संग ही डोलें

काँटों को जो फूल बना दे
संग उसके ही स्वप्न पिरो लें

अंतर वीणा को जो गा दे
उसके ही नयनों को तोलें  

सम्भव सब है इस चोले में
मानव हो हर दुःख को धो लें

जो भी इर्द - गिर्द फैला है
उत्सव बनकर उसमें खो लें




शुक्रवार, मई 25

जीवन की आपाधापी सच


जीवन की आपाधापी सच

जब दुःख की वीणा छेड़ी थी
पीछे चल रहा जमाना था,
अब सुख का राग उठा जब से
सँग अपने अब वीरानी है !

दुःख ही बोये दुःख ही काटे
सुख की भाषा बेगानी सी,
जीवन की आपाधापी सच
उसकी न कोई निशानी है !

जब बरस रहा सुख का बादल
दुःख की छतरी को ओढ़े हैं,
जब सारा आलम है अपना
तिनके जोड़ें क्यों ठानी है !

कुछ मन को ही सब कुछ मानें
कुछ देह सजाने में शामिल,
कुछ रोग मिलें, कुछ कुंठाएं
क्या व्यर्थ नहीं यह रवानी है !

कोई मांग रहे भिक्षा सुख की
रिश्तों की सांकल खटकाए,
जो स्वयं की प्यास बना घूमे
नयनों से बहता पानी है !

जो नहीं है अपने पास यहाँ
आशा औरों से करते क्यों,
अपने दामन में छिद्र हुए
दोहराई वही कहानी है !