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बुधवार, फ़रवरी 22

किंतु न जानूँ पथ पनघट का


किंतु न जानूँ पथ पनघट का

पंथ निहारा, राह बुहारी 

लेकिन तुम आए नहीं श्याम, 

नयन बिछाए की प्रतीक्षा 

बीत गए कई आठों याम !


अंतर में संसार भरा था 

शायद तुम एकांत  निवासी, 

कहाँ बिठाती इस दुविधा से 

बचा गए मुझको घनश्याम !


अब यह सूनापन भाता है 

हर आहट पर हृदय धड़कता, 

एक नज़र ही पा जाए मन 

नहीं औरों से मुझको काम !


नगरी तेरी दूर  नहीं है 

किंतु न जानूँ पथ पनघट का, 

जीवन की संध्या  घिर आयी 

कब दर्शन  मिले  मनोभिराम !


बुधवार, अगस्त 19

योग और प्रेम

योग और प्रेम 

 

जानने की इच्छा 

खुद को जानने की 

यदि जानने वाले की इच्छा बन जाये 

अर्थात ज्ञाता यदि स्वयं को जानने की इच्छा करे 

तो जो क्रिया करनी होगी उसे 

वही तो योग है !

 

जानने वाला यदि श्याम हो 

जानने की इच्छा राधा है 

जानने की क्रिया ही तो प्रेम है !

 

श्याम को इच्छा जगी स्वयं को देखे 

वह इच्छा ही राधा है 

वह देखना ही प्रेम है !

 

 शिव को इच्छा जगी सृष्टि करे 

वह इच्छा ही ‘शक्ति’ है 

राधा बने तो स्वयं को देखा 

शक्ति बने तो सृष्टि की 

सृष्टि की रचना भी प्रेम ही है !

 

बुधवार, फ़रवरी 22

एक छुअन है अनजानी सी



एक छुअन है अनजानी सी 


शब्दों में कैसे ढल पाए 
मधुर रागिनी तू जो गाए,
होने से बनने के मध्य 
गागर दूर छिटक ही जाए !

एक छुअन है अनजानी सी 
प्राणों को जो सहला जाती,
एक मिलन है अति अनूठा 
हर लेता हर व्यथा विरह की !

मदिर चांदनी टप-टप टपके
कोमलतम है उसका गात,
 तके श्याम बाट राधा की 
 भूली कैसे वह यह बात !

जिस पल तकती वही वही है 
मौन रचे जाता है गीत,
ज्यों प्रकाश ही ओढ़ आवरण 
बहता चहूँ  दिशि बनकर प्रीत !

जाने कितने करे इशारे 
अपनी ओर लिए जाता है,
पल भर काल न तिल भर दूरी 
अपनी खबर दिए जाता है !