किंतु न जानूँ पथ पनघट का
पंथ निहारा, राह बुहारी
लेकिन तुम आए नहीं श्याम,
नयन बिछाए की प्रतीक्षा
बीत गए कई आठों याम !
अंतर में संसार भरा था
शायद तुम एकांत निवासी,
कहाँ बिठाती इस दुविधा से
बचा गए मुझको घनश्याम !
अब यह सूनापन भाता है
हर आहट पर हृदय धड़कता,
एक नज़र ही पा जाए मन
नहीं औरों से मुझको काम !
नगरी तेरी दूर नहीं है
किंतु न जानूँ पथ पनघट का,
जीवन की संध्या घिर आयी
कब दर्शन मिले मनोभिराम !
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