मंगलवार, जून 15

हम एकाकी

हम एकाकी

जग में आते हम एकाकी
पल दो पल का संग यहाँ
जग से जाते हम एकाकी
कौन चला है संग वहाँ I

स्वयं का जब तक साथ न पाले
हर कोई एकाकी जग में
स्वयं की भीतर थाह न पाले
हर कोई प्यासा मग में I

प्रेम यदि पाया भीतर तो
सारी सृष्टि प्रेम लुटाती
स्वयं से जो न जुड़ पाया
पीड़ा मन की रहे लुटाती I

भीतर जाकर झोली भर ली
वही लुटा सकता आनंद
जिसके साथ सदा रब रहता
वही बहा सकता मकरंद I

स्वयं के साथ रहे जो अविरत
स्वयं से नाता जोड़ा जिसने
वही दूसरों से जुड़ सकता
स्वयं को मीत बनाया जिसने I

अनिता निहालानी
१५ जून २०१०

1 टिप्पणी:

  1. सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

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