सोमवार, अक्तूबर 25

अनहद नाद

अनहद नाद

ढोल बजें कभी गरजें मेघ
मधुर कृष्ण बांसुरी की धुन
चहकें पंछी कभी हजारों
मदिर घुंघरूओं की रुनझुन !

कभी बजें इकतारे के सुर
वीणा पर कभी गूंजें राग
अद्भुत ध्वनियाँ कौन सुनाये
कौन सुनाये फाग, विहाग ?

सुनते सुनते मन खो जाये
गहन मौन भीतर छा जाये
मौन से उपजे है संगीत
सन्नाटा भी गीत सुनाये !

दस्तक देता वह अव्यक्त
मिलने के उसके यही ढंग
झलक दिखाता छुप जाता फिर
अदृश्य के अनगिन हैं रंग I

अनहद नाद गूंजता भीतर
उसके ही संदेशे लाता
शांति, प्रेम के पुष्प खिलाकर
सुरभि अनोखी से भर जाता I

है ज्योतियों की ज्योति वह
एक सुनहला ज्ञान प्रकाश
स्वयं ही स्वयं पर रीझे मुग्ध
स्वयं को दे अनंत आकाश !

अनिता निहालानी
२५ अक्टूबर २०१०    


4 टिप्‍पणियां:

  1. कैसी है अनुभूती कैसा है एहसास
    मेरे अन्तस म
    तेरे सौरभा की
    रजत किरणो का आभास्
    बहुत सुन्दर अध्यात्म रस मे लिखी गयी आपकी कविता बहुत अच्छी लगी। इन्हीं क्प समर्पित ऊपर मेरी कुछ पँक्तियां। शुभकामनायें।

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  2. anhad hai isliye kisi nahi takraata;isiliye shayad hrdy me shanti upjata. aapki sundar kavita ne mere man me anhad naad kee goong gunja di .

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  3. आभार एवं अनहद में डूबने के लिये मेरी भी शुभकामनाएँ!

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  4. अनीता जी,

    बहुत सुन्दर.........आप बहुत ऊंचाई की कवितायेँ लिखती हैं....आपकी कवितायेँ सीधे आत्मा में प्रवेश कर जाती हैं....ये पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी...

    मौन हुआ मन
    है स्थिर तन
    बरसी भीतर रस पिचकारीI

    अगन विरह की
    तपन हृदय की
    जल जाये हर चाह हमारी I

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