बुधवार, अक्तूबर 6

सदगुरु

सदगुरु

सदगुरु का गुरुत्व अनोखा
ईश्वरीय ज्योति सरीखा,
जो अनंत प्रेम बरसाए
उत्सव जीवन में ले आये !

जग का मार्ग बड़ा कंटीला
सदगुरु का पथ रंगीला,
श्रद्धा, शील, प्रज्ञा का दाता
सहज समाधि का प्रदाता I

कुछ पालूं, कुछ तो बन जाऊं
इस चक्र से बाहर निकाले
बिना किये ही जो मिलते हैं
दे प्रसाद में सुख निराले I

कोहिनूर सा जगमग चमके
सदगुरु है जीवन की ज्योति
बरसाएँ प्रमुदित मन सारे
आनंद अश्रुओं के मोती !

दूर रहे न निकट ही रहता
जहाँ भी हो सुरभि फैलाये
श्रद्धा के सेतु पर दिल के
संदेशे आयें और जाएँ I

अनिता निहालानी
६ अक्तूबर २०१०

1 टिप्पणी:

  1. सही कहा है अनीता जी.....बिना सदगुरु सब अधूरा है ........ये बात पसंद आई की आपने सिर्फ गुरु की जगह सदगुरु का प्रयोग किया क्योंकि इन दो शब्दों में ज़मीन-आसमान का फर्क है |

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