बुधवार, अक्तूबर 13

सारे जग को मीत बना लें

सारे जग को मीत बना लें

सीखें जगना और जगाना
स्वयं को पाकर उसको पाना
उसके बिना है सूना जीवन
गीतों में संदेश सुनाना I

जग के आकर्षण में फँसकर
भूल गए हम अपना ही घर
जहाँ एक दिन सबको जाना
जहाँ गूंजते मुक्ति के स्वर I

अभी कहाँ जग पाकर पाया
केवल भ्रम को गले लगाया
जग यह, तब ही, अपना होगा
जग कर जब जगदीश को ध्याया I

छल का ही व्यापार यहाँ है
जीवन का आधार कहाँ है ?
जिन बातों पर मरते मिटते
उनमें कोई सार कहाँ है ?

झूठ-मूठ ही खेला करते
अपनेपन का दम हम भरते
निज से ही जो प्रेम किया न
प्रेम कहाँ दूजों से करते I

एक बार बस मूल को पालें
फिर चाहे छलांग लगा लें
स्रोत ऊर्जा का भीतर पा
सारे जग को मीत बना लें !
अनिता निहालानी
१३ अक्तूबर २०१०

3 टिप्‍पणियां:

  1. "छल का ही व्यापार यहाँ है
    जीवन का आधार कहाँ है ?
    जिन बातों पर मरते मिटते
    उनमें कोई सार कहाँ है ?

    झूठ-मूठ ही खेला करते
    अपनेपन का दम हम भरते
    निज से ही जो प्रेम किया न
    प्रेम कहाँ दूजों से करते "

    बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ........दिल को छू लेने वाली........कितनी सच्चाई होती है आपकी कविताओं में.......शानदार |

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  2. एक बार बस मूल को पालें
    फिर चाहे छलांग लगा लें
    स्रोत ऊर्जा का भीतर पा
    सारे जग को मीत बना लें !
    ..बहुत ख़ूबसूरत...ख़ासतौर पर आख़िरी की पंक्तियाँ....मेरा ब्लॉग पर आने और हौसलाअफज़ाई के लिए शुक़्रिया..

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