गुरुवार, मई 9

अम्बर भी है बातें करता


अम्बर भी है बातें करता


एक सहज उल्लास जगायें
भीतर इक विश्वास उगायें,
प्रेम लहर अंतर को धोए
कैसे वह प्रियतम छिप पाए !

यहीं कहीं है देख न पाते  
व्यर्थ विरह के नगमे गाते,
यूँ ही हैं हम आँखें मूंदें
सम्मुख है जो नजर न आये !

वह रसधार बही जाती है
सूखी डाली हरी हुई है,
ओढ़ी थी जो घोर कालिमा
हटा आवरण ज्योति खिली है !

भीतर सरवर के सोते हैं
एक फसल उगी आती है,
चट्टानों को भेद शीघ्र ही
कल-कल स्वर से भर जाती है !

कैसा अनुपम प्रेम बरसता
कुदरत के कण-कण से झरता,
हवा कहे कुछ सहलाती जब
अम्बर भी है बातें करता !


10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर उल्लासमयी अभिव्यक्ति...आभार

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  2. ्बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. कैसा अनुपम प्रेम बरसता
    कुदरत के कण-कण से झरता,
    हवा कहे कुछ सहलाती जब
    अम्बर भी है बातें करता !

    बहुत सही ..

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  4. कैसा अनुपम प्रेम बरसता
    कुदरत के कण-कण से झरता,
    हवा कहे कुछ सहलाती जब
    अम्बर भी है बातें करता ...!प्रकृति का सुन्दर् चितरण

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  5. प्रकृति की सुंदरअभिव्यति!!

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  6. यहीं कहीं है देख न पाते
    व्यर्थ विरह के नगमे गाते,
    यूँ ही हैं हम आँखें मूंदें
    सम्मुख है जो नजर न आये !

    बहुत बढ़िया...
    सादर
    अनु

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  7. प्रकृति का अनुपम भाव उभारती रचना !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
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  8. कैलाश जी, कालीपद जी, वन्दना जी, अनु जी, रंजना जी, संगीता जी, माहेश्वरी जी, आप सभी का स्वागत व आभार !

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