मंगलवार, मई 7

ऐसा भी होता जीवन में


ऐसा भी होता जीवन में



छा जाता भीतर सन्नाटा
कोई शब्द न लेता श्वास,
कविता जैसा कुछ उभरेगा
नहीं जगाता कोई आस !

जैसे बंद गली हो आगे
भान हुआ तो होती खीझ,
वैसे इस मन का सूनापन
कैसे इस पर जाएँ रीझ !

जहां खिले थे कमल हजारों
आज वहाँ मटियाला सा जल,
जहां रचे थे गीत हजारों
आज वहाँ न कोई हलचल !

ऐसा भी होता जीवन में
धारा समय की रुख मोड़ती,
आज जहाँ रेतीले मंजर
कभी वहीं थी नदी गुजरती !

दूर खड़ा होकर जो देखे
इस प्रपंच से न उलझे,
वरना गुंथे हुए हैं रस्ते
कैसे इसके बल सुलझें !

15 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर कविता. इसे समय की इच्छा कहें या आदेश, जो है उसी का खेल है.

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    1. निहार जी, सही कहा है आपने, यह समय का आदेश ही है...आभार!

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  2. ऐसा भी होता जीवन में...
    ऐसा ही होता है जीवन........

    बहुत बढ़िया!!!

    सादर
    अनु

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    1. अनु जी, यदि केवल ऐसा ही हो जीवन तो कितना वीराना होगा..ऐसा भी है कहना ठीक होगा...आभार !

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति!!

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  4. @ कविता जैसा कुछ उभरेगा
    नहीं जगाता कोई आस !

    किससे उम्मीदें और क्यों ...??
    यह तो अन्दर है केवल सहलाना भर है ..बस !!
    मंगलकामनाएँ आपको !

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    1. सतीश जी, सही कहा है आपने, सब भीतर है..कभी ढक जाता है कभी उभर जाता है..

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  5. जीवन इसी का नाम है..बहुत सुन्दर .

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    1. माहेश्वरी जी, स्वागत व आभार!

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  6. कभी-कभी ऐसा होता है -परिवर्तन के क्रम में .पर उसमें भी आपके लिये कुछ जरूर होगा जो तटस्थ और विरक्त न होने दे,मन हमेशा एक सा नहीं रहता .इतनी शीघ्रता में निष्कर्ष मत निकालिये .अभी आगे बहुत है-बस थोड़ा समय!

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    1. प्रतिभाजी, वाकई, अधीर मन की निशानी है यह शिकायत..आपने मर्ज को कितनी आसानी से पहचान लिया..आभार!

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  7. हाँ!ऐसा भी होता जीवन में..

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