शुक्रवार, मार्च 10

दिल का द्वार रहे उढ़काए


दिल का द्वार रहे उढ़काए 


नजर चुरायी जिस क्षण तुझसे 
खुद से ही हम  दूर हो गये, 
तेरे दर पर झुके नहीं जो 
 दिल खुद से मजबूर हो गये  !

स्वप्निल नैना बोझिल सांसें  
दूर खड़ी ललचाती मंजिल,
कितने दांवपेंच खेले पर 
सभी इरादे  चूर हो गये !

राग जगाता जग भरमाता 
हर सुकून ख्वाब बन टूटा, 
मनहर खेल रचाए जितने  
आखिर सभी  कुसूर हो गये !

हर उस क्षण तू वहीं रुका था 
हाथ बढ़ाने से मिल सकता,
कैसी मदहोशी छायी थी 
भूले से मगरूर हो गये !

सुने थे तेरे कई फसाने 
है अनंत प्रेम का सागर,
दिल का द्वार रहे उढ़काए 
इसमें ही मशहूर हो गये !




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