बुधवार, मार्च 22

ओ रे मन !


ओ रे मन !

किस उलझन में खोये रहते 
किस पीड़ा को पल-पल सहते,
सुनो गीत जो नभचर  गाते
निशदिन  मधुर राग बहता है !

किस शून्य को भरे हो भीतर 
कण-कण में अनहत बजता है,
सपनों ने दिन-रात जलाया 
खुली आंख ही वह मिलता है !

एक विशाल वितान सजाया  
रंगमंच पर नट अनेक हैं,
सुख-दुःख के झीने पर्दे में 
सदा एकरस कुछ रिसता  है !

पाँव रुके उर की जड़ता से 
चाह अधीर करे धड़कन को,
दोनों ही के पार गया जो 
हरसिंगार चुना करता है !


6 टिप्‍पणियां:

  1. मन की उड़ान को परखना बेहद कठिन है. सु-:दुःख तो आते-जाते रहेंगे, पर जिसके ह्रदय अमृत कण बसता हो. उसकी बात ही जुदा है.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. अंतर में अमृत की खबर जिसको मिल गयी वह तो जगत में लीला करने के लिए ही रहता है

      हटाएं
  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 23-03-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2609 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार दिलबाग जी !

      हटाएं
  3. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति विश्व जल दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। एक बार आकर हमारा मान जरूर बढ़ाएँ। सादर ... अभिनन्दन।।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार हर्षवर्धन जी !

      हटाएं