सोमवार, अगस्त 20

पुनः पुनः मिलन घटता है




पुनः पुनः मिलन घटता है



निकट आ सके कोई प्रियतम
तभी दूर जाकर बसता है !

श्वास दूर जा नासापुट से
अगले पल आकर मिलती है,
आज झरी मृत हो जो कलिका
पुनः रूप नया धर खिलती है !

बार–बार घट व्याकुल होकर
पाहुन का रस्ता तकता है,
उस प्रियजन का निशिवासर जो
नयनों में छुपकर हँसता है !

घर से दूर हुए राही को
स्वप्नों में आंगन दिसता है,
मेघ चले जाते बिन बरसे
मरुथल में सावन झरता है !

4 टिप्‍पणियां:

  1. दो विपरीत चीजें कैसे जुडी हैं एक दूजे से ...
    एक जाता है तो करीब आने के लिए ... और करीब आने पर ही उसका एहसास सत्य, शिव और सुन्दर होता है ... सुन्दर शब्दों से सज्जित रचना ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुंदर शब्दों में आपने कविता के भाव को सहेजा है, स्वागत व आभार दिगम्बर जी !

      हटाएं
  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 101वीं जयंती - त्रिलोचन शास्त्री और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

    जवाब देंहटाएं