शुक्रवार, जनवरी 8

सपनों से जब पार गया मन

सपनों से जब पार गया मन 

सुंदर सपने, कोमल आशा 

पढ़ी प्रेम की यह परिभाषा,  

सपनों से जब पार गया मन 

संग निराशा छूटी आशा !


उसी प्रेम में उठना सीखा

 जिसमें लोग गिरा करते हैं,

शब्दों का अब भेद खुल गया 

 मतभेद, मनभेद भरते हैं !


मौन समझ लें इकदूजे का 

जब हम ऐसी जगह आ गये, 

सहज शांति, आत्मीयता के 

सान्निध्य में मन गुल खिल गए ! 


अब न कहीं जाना, कुछ पाना 

दो ना एक हुए रहते हैं, 

एक बोलना यदि चाहे तो  

कर्ण दूसरे के सुनते हैं !


12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (10-01-2021) को   ♦बगिया भरी बबूलों से♦   (चर्चा अंक-3942)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --हार्दिक मंगल कामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  2. जय मां हाटेशवरी.......

    आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
    आप की इस रचना का लिंक भी......
    10/01/2021 रविवार को......
    पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
    शामिल किया गया है.....
    आप भी इस हलचल में. .....
    सादर आमंत्रित है......


    अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
    https://www.halchalwith5links.blogspot.com
    धन्यवाद

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  3. 'मौन समझ लें इकदूजे का
    जब हम ऐसी जगह आ गये,'
    - और क्या चाहिये ,यही तो साध्य है.

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  4. सुंदर सपने, कोमल आशा
    पढ़ी प्रेम की यह परिभाषा,
    सपनों से जब पार गया मन
    संग निराशा छूटी आशा !

    कोमल भावनाओं से ओतप्रोत बहुत सुंदर इस रचना के लिए बधाई अनिता जी 🌹🙏🌹

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  5. उपनिषद सम सूत्र .... गहरे पानी पैठ ।

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  6. कोमल भावनाओं का ताना-बाना।
    बहुत सुंदर।
    इस रचना के लिए ढेरों बधाई अनिता जी।
    सादर।

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