आत्म सूर्य
तप में लीन है सूर्य
किसी तापस सा
अथवा
एक यज्ञ चल रहा है अनवरत
सूर्य की सतह पर !
ऊर्जाएँ बन रही हैं
बदल रही हैं
सारे ग्रह, धरा और चन्द्र
जो कभी उसके अंश थे
अब एक परिवार की तरह
उसके अनुयायी हैं !
शीतल हैं
चाँद की किरणें
धरा को पोषित करतीं
जगा जाते हैं सूर्य के हाथ
भूमि की संतानों को !
उसी ज्योति का प्रसाद
पंछियों का कलरव
और जल का कलकल भी
सारे तत्व उसी की देन हैं !
आत्मा सूर्य है
मन चंद्रमा, धरती देह
आत्मा पोषित करती है
देह को अदृश्य हाथों से
मन का द्वन्द्व
वहीं से आया है !
तप करके
ही कर सकती है
आत्मा उस विश्व का निर्माण
जो न्यायपूर्ण हो !

