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शुक्रवार, सितंबर 22

संग-साथ

 संग-साथ 


प्रेम का अदृश्य वस्त्र 

ओढ़कर हम चलते हैं 

जीवन के उतार-चढ़ाव के मध्य 

जो कभी भी पुराना नहीं होता 

तो कोई साथ-साथ चलता है 

हर धूप हर तूफ़ान से 

सामना करते हुए 

वह हमें देखता है !

शांति की एक धार 

भिगो जाती है 

जब हमारी दुआओं में 

फ़िक्र सारी कायनात की 

भर जाती है

एक माँ के दिल की तरह 

तब हम उसे अपने भीतर 

धड़कता हुआ पाते हैं !

जो जानता है बारीकियाँ  

हर शै की 

वह पढ़ लेता है 

छोटी से छोटी ख्वाहिश 

जो भीतर जन्म लेती है 

और हम मुक्त होकर 

विचरते हैं जगत में 

जैसे कोई बादल 

अनंत आकाश में 

 या मीन सागर में !


गुरुवार, अप्रैल 8

उस दिन

उस दिन 

यह सारी कायनात 

उस दिन चलेगी 

हमारे इशारे पर भी 

जब हमारी रजा 

उस मालिक की रजा से एक हो जाएगी 

जब हमारी दुआओं में 

हरेक की सलामती की ख्वाहिश भी 

सिमट आएगी 

जब चाहतें पाक होंगी और दिल मासूम 

तब जो घटेगा वह हमें भी 

नहीं होगा मालूम 

पर रहमतों की बूंदें बिन बात ही बरस जायेंगी  

हमारी झोली अचानक ही भर जाएगी 

जब श्रद्धा का बिरवा मन में रोप दिया जाएगा 

तब उस अनाम का वरदान 

दिन-रात मिलने लगेगा 

जब इस सच की आंच भीतर झलक जाएगी 

तब दुनिया जैसी है वैसी ही नजर आएगी 

अपना सुख-दुख जब औरों का सुख-दुख बन जाएगा 

तब वह मालिक हमारे द्वारा मुस्कुराएगा !

 

रविवार, मई 24

ईद मुबारक

ईद मुबारक 


लो फिर आ गयी ईद 
दिखा चांद... मुस्काया अंबर 
दिलों में मचलने लगे कितने ही मंजर 
उन हवाओं के झूले में झूलने लगा मन 
जो लिए आती थीं रमजान के बाद 
ईद मिलन की खुशबुएँ अपने साथ 
पहली अजान पर ही उठ जाना बिस्तर से 
सफेद झक्क कुर्ते में छोटे भाई का सुबह-सुबह सजना 
पकड़ कर उंगली भाईजान की, इबादत को निकल पड़ना 
लहंगों-शरारों को तह देकर अलमारी में सजाना 
वह गले मिलना और दुआ के लिए हाथ बढ़ाना 
वह ईदी देना छोटों को और बड़ों से पाना 
देकर जकात कुबूल करवाना खुदा से रोजा
‘ईद मुबारक’ कह कर हरेक से दुआएं बटोरना !
गाढ़े दूध से सेवइयां बनाकर मेवों से सजाना 
मीठी हो सबकी ईद यह अल्लाह से मनाना !

शुक्रवार, जनवरी 27

उन सभी के लिए जिनके विवाह की इस वर्ष पचीसवीं सालगिरह है


विवाह की पचीसवीं सालगिरह पर 


स्वयं को केंद्र मानकर
दूसरे को चाहना पहली मंजिल है
जो वर्षों पहले आप दोनों ने पा ली थी

दूसरे को केंद्र मानकर
स्वयं को समर्पित कर देना दूसरी
जिसकी तलाश पूरी होने को है

न स्वयं, न दूसरे को 
अस्तित्त्व को केंद्र मानकर
मुक्त हो जाना अंतिम सोपान है

जिसकी दुआ हम देते हैं
खुद से पार चला जाये जब कोई
तब सिद्ध होता है अभिप्राय
आप के जीवन में
जल्दी ही ऐसा दिन आए ! 

रविवार, जून 26

ज्यों की त्यों

ज्यों की त्यों

हर लहर जो सागर से निकलती है
सागर की खबर देती है
हर दुआ जो दिल से निकलती है
दिलबर की खबर ही देगी न ....
और दुआ ही क्यों, हर बददुआ भी
उसके बगैर तो आ नहीं सकती
 यह बात और है कि
हमें आदत है मिलावट की
हर शिशु निर्दोष ही आता है जग में
पर वैसा ही वापस नहीं जाता
कबीर की तरह मन को चादर को
ज्यों की त्यों रखना जो हमें नहीं आता !