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शुक्रवार, अप्रैल 17

इक राह नई चुननी है

इक राह नई चुननी है 


इक राह नई चुननी है 
रक्षित दुर्ग बनाना है, 
इस अनजाने दुश्मन से
सबको ही बचाना है !

धीरज की बाँह पकड़कर 
सहना है हर अनुशासन ,
मन ना कोई विचलित हो
 शुभ संदेश सुनाना है !

थोड़े में गुजारा हो 
मिल बांट के हम खाएँ,
कोई भी अकेला हो 
उसे ढूंढ के लाना है !

मीलों की भले दूरी 
दिल से नहीं दूर रहें, 
करुणा जगे अंतर में 
यही फूल खिलाना है !

शुक्रवार, फ़रवरी 17

उसने कहा था



उसने कहा था

सारी कायनात भी छोटी पड़ती है
प्रेम लुटाने के लिये मुझे
और झगड़ने के लिये भी तुम्हें
मेरी जरूरत पड़ती है....

मैं तुम्हें प्रेम कर सका
क्योंकि मैंने चाहा सम्पूर्ण अस्तित्त्व को
तुम खफा हो मुझसे भी
सारी दुनिया नजर आती है शायद
दुश्मन तुम्हें...

अकारण चहकता है मेरा मन
क्योंकि जीवन एक रहस्यमय घटना है
तुम उदास हो
हर शै की तह तक जाकर भी....