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बुधवार, अक्टूबर 14

देखो पल में कहाँ खो गया

देखो पल में कहाँ खो गया


बड़ी-बड़ी बातें करता था
पा के रहेंगे दम भरता था
था कितना दीवाना सा दिल
मुट्ठी में रेत भरता था !

बात-बात पर रूठा करता
घड़ी-घड़ी जो टूटा करता
था कितना अनजाना सा दिल
अपना दामन आप धो गया !

अपना कद ऊंचा करने की
ज्ञान निधि भीतर भरने की
तिकडम सदा लगाता जो दिल
स्वयं ही तो शून्य हो गया !

इसे बता दे उसे जता दे
इसे सिखा दे उसे धता दे
 इसी जोड़तोड़ में रहता
दिल बेचारा धूल हो गया !

मिटकर ही चैन पाया है
लौट के अपने घर आया है
एक बबूला ही तो था दिल
पल भर में ही हवा हो गया !

कितने ही दावे कर डाले
महल हवा में ही गढ़ डाले
पानी में दीवारें चुनता
अन्तरिक्ष में कहीं खो गया !