रेत पर टिकते नहीं घर
स्वप्न ही तो है जगत यह
टूटना नियति है इसकी,
सत्य मानो या सहेजो
छूटना फ़ितरत इसी की !
आँख भरकर देख लो बस
मुस्कुरा लो साथ मिलकर,
किंतु न बाँधो उम्मीदें
रेत पर टिकते नहीं घर !
ओस की इक बूँद हो ज्यों
है यही सौंदर्य इसका,
गगन में रंगों का मेल
नदी में ज्यों बहे धारा !
प्रीत की जो बेल बोई
वह सदा उसके लिए है,
भ्रम हुआ जब जगत चाहा
शाश्वत सदा अप्रगट है !
जगत माला में पिरोया
स्वयं बनकर पूर्ण आया,
स्वयं को ही देखते हम
स्वप्न का लेते सहारा !



