बुधवार, सितंबर 14

जरा सोचें तो


जरा सोचें तो

कहीं कुछ हुआ भी है,
जो व्यर्थ शोर मचा रहे हैं ..

जिसे दुश्मन मान कर हम जंगल में
रोता छोड़ आए हैं 
वह हमारा ही दूसरा अवतार है !

जो बड़ी-बड़ी डींगे मार रहे थे
अपने कृत्यों की
कराने वाला तो वही करतार है !

दर्द से कराहते जो फिर रहे
वह हम नहीं
बस हमारी देह बीमार है !

दिवास्वप्न जो देखा करते
झूला करते उडनखटोले पर 
उसी जादूगर का चमत्कार है !

8 टिप्‍पणियां:

  1. हम में तुम कि तुम में हम
    सारा गड़बड़झाला है |
    आत्मा ही परमात्मा का
    पावन अंश निराला है ||

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  2. दर्द से कराहते जो फिर रहे
    वह हम नहीं
    बस हमारी देह बीमार है !
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.......आभार

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  3. कल 16/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. क्या कहूँ अनीता जी..........कई बार शब्द मिल ही नहीं पाते आपके ब्लॉग की पोस्ट पर देने के लिए ............शब्दों में इस गहरे को नहीं मापा जा सकता......हैट्स ऑफ

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  5. sach kaha aapne. yahi saty hai lekin koi bhi saty ko sunNa/janNa nahi chaahta...sab apni main me jiye chale jate hain. sunder abhivyakti.

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  6. बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति ....

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