शनिवार, अगस्त 18

युवा कवि यशवंत माथुर की कवितायें- खामोश ख़ामोशी और हम में


खामोश ख़ामोशी और हम के अगले कवि हैं यशवंत माथुर, ब्लॉग जगत का यह एक चिर परिचित नाम है, नई पुरानी हलचल के संचालक, जिनका पूरा नाम यशवंत राजबली माथुर है. आठ वर्ष की उम्र से अपने पिता को देखकर इन्होने लिखना शुरू किया. इस संकलन में इनकी आठ कवितायें हैं.
इनकी कविताओं का मूल स्वर एक तलाश है, लेकिन जीवन के पथ पर चलते हुए यह  बार-बार खुद को उसी मुकाम पर पाते हैं, यह एक ऐसी सच्चाई है जिसकी ओर बहुत कम लोग देख पाते हैं, जीवन एक रेखा में नहीं बढ़ता एक वर्तुल में घूमता है, सृष्टि में जैसे लौट-लौट कर वही मौसम आते हैं जीवन में भी कुछ ऐसा है जो बार बार दोहरता है. इनकी पहली कविता है ‘उड़ता रहूँ’ –

अब गिद्ध नहीं हैं आसमां में
तो सोच रहा हूँ
बेखौफ परिंदों की तरह
भर लूँ उड़ान
..
अनंत ऊँचाईयों तक
...
जहाँ सिर्फ
मेरी ही आवाज हो
मेरा ही नीरस गीत हो
और मेरा ही साज हो
...
मैं जानता हूँ
कोई तो होगा साथ
जो थामेगा
...
रहने देगा गतिमान
ऊपर की ही ओर
...
डरता हूँ
नीचे गिरने से
..
क्योंकि
गुरुत्वाकर्षण का रूप
धर कर
भूखा काल
नीचे
कर रहा है
मेरी प्रतीक्षा 

दूसरी कविता ‘सम्पन्नता का आधार’ में उन सामान्य जन की बात है, जो स्वयं तो छोटे से घर में, जिसकी छत टीन की है, गुजर करते हैं, पर अपनी मेहनत से बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं का निर्माण करते हैं.

हर रोज
चौराहे  पर
दिखती है भीड़
लोगों की कारों में
आते जाते लोगों की
सरसराते भागते लोगों की
...
घिसट घिसट कर चलते लोगों की
फुटपाथों पर सोते लोगों की
...
और उसी भीड़ में कहीं
फावड़ा छेनी हथौड़ा थामे भी
दिख जाते हैं नर नारी
और गोद में शिशु
जिनकी अपनी ही छोटी सी दुनिया है
..
फावड़ा थामे वो हाथ
मैले से कपड़ों में सिमटे वो लोग  
आधार हैं
सम्पन्नता का
फुटों-मीटरों ऊँची दीवारों पर
एक पटरे पर अटकी रहती है
जिनकी सांसों की डोर
...
गुमनाम
ठीक वैसे ही 
जैसे अपने में खोई रहती है
अट्टालिकाओं की नींव.

‘मुस्कुरा रहा हूँ’ कविता एक सहज आत्मस्वीकृति है, जो दिल को गहरे तक छू जाती है -

अच्छा या बुरा जो चाहे समझ लो मुझको
जो मेरा मन कहे वो करता आ रहा हूँ
कितने भी तीर चुभो दो भले ही
मैं मुस्कुरा  रहा हूँ
...
मौन रहकर भी मैं कुछ न कुछ कहता जा रहा हूँ
..
मैं मुस्कुरा रहा हूँ
कि मुस्कुराना फितरत है मेरी
खुद की नजरों में पल पल
मैं चढ़ता जा रहा हूँ

‘नए दौर की ओर’ में कवि फिर से कुछ नयी मंजिलों को पाने के लिये ख्वाब देखता है, और उसे इस बात का पता है कि मंजिल वहाँ भी नही है वहाँ से आगे फिर एक नयी तलाश शुरू होगी

शरू हो गया
फिर एक नया दौर
कुछ आशाओं का
महत्वाकांक्षाओं का
..
ये नया दौर
क्या गुल खिलाएगा
..
नहीं पता
...
वक्त की कठपुतली बना
चला जा रहा हूँ
एक नए दौर की ओर
जहाँ
...
फिर से इंतजार करूँगा
एक और
नए दौर का

अगली कविता ‘अजीब से ख्याल’ में कवि मन में उमड़ते ख्यालों को शब्द देता है और पाठकों को भी आमन्त्रण देता है कि वे भी अपने मन की बातों को शब्द दें, उन्हें मन में ही न रह जाने दें

कभी सोते में
सपनों के सतरंगी समुन्दर में
कभी कुछ कहते हुए
कभी कुछ सुनते हुए
...
कहीं काम पर पसीना बहता
मजदूरों को देखकर
शीत लहरी में ठिठुरते हुए
 ...
वक्त बेवक्त
कुछ ख्याल
अक्सर मन में आते हैं
...
डरता हूँ मेरे अजीब से
ख्यालों को सुनकर
वि हँस न दें ..
पर आखिर मैं क्यों चुप रहूँ
क्यों न कहूँ अपने मन की
...
इन ख्यालों को लिख देना चाहता हूँ
कह देना चाहता हूँ
उन से
जो इन ख्यालों का
ख्याल रखते हों
दिल से !

‘मोड़’ कविता में उसी दोहराव की बात है जिसका जिक्र ऊपर किया गया है-
कल जहाँ था
आज फिर आ खड़ा हूँ उसी मोड़ पर
...
उस मोड़ पर
सब कुछ
बिल्कुल वैसा ही है
..
यह दोहराव अचानक
क्या सिर्फ मेरे साथ है
या दोहराव होता है
कभी न कभी
सबके साथ
...
जब मिल जाता है
यूँ ही
कोई भुला बिसरा मोड़
जिससे होकर गुजरना ही है
क्यों कि
न कोई विकल्प
और न कोई और
रास्ता ही है
इस एक मोड़ के सिवा

‘मौसम और मन’ में कवि मन के विभिन्न मूड्स की तुलना मौसम के बदलते रूपों से करता है.

...
बदलता है मौसम
पल पल रंग

मन भी तो ऐसा ही है
..
कभी अनुराग रखता है
प्रेम में पिघलता है
और कभी जलता है
द्वेष की गर्मी में
...
क्या हो रहा है
सही या गलत
समझ नहीं पता है
जम सा जाता है मन
...
जब बरसता है
बेहिसाब बरसता ही चला जाता है
...
खुद तो भीगता ही है
सबको भिगोता भी है
...
वसंत जैसा मन !
हर पल खुशनुमा सा
..
अपने मन की बातें करता है
..
खेतों में मुस्कुराते
सरसों के फूलों में
जैसे देख रहा हो
अपना अक्स

मौसम और मन
कितनी समानता है
..
ज्वालामुखियों के जैसी
और कभी
बिल्कुल शांत
आराम की मुद्रा में
लेटी हुई धरती के जैसी

युवा कवि अंतिम रचना ‘डगमगाते कदम’ में बचपन की स्मृतियों को आधार बनाता है, अभिमान को साधने के लिये आत्म मंथन के लिये कभी कभी ठोकर खाना भी जरूरी होता है.

जब चलना सीखा था
बचपन में
...
डगमगाते कदमों को
प्रेरणा मिल ही जाती थी
तालियों की
मुस्कुराहटों की
बल मिल ही जाता था
जमीन पर स्थिर करने को
नन्हें नन्हें कदमों को
...
कदम अब भी लडखडाते हैं
डगमगाते हैं
डगमगाना जरूरी है
गिरना जरूरी है
...
परिवर्तन के लिये
जरूरी हैं
ये डगमगाते हुए से कदम !

जीवन में परिवर्तन पल-पल हो ही रहा है पर अपेक्षित परिवर्तन हो इसके लिये जरूरी है आत्म मंथन और चिंतन, इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे जीवन के कई सूत्र मिले, आशा है आप भी अपने भीतर इन्हें गूंजता पाएंगे.    

7 टिप्‍पणियां:

  1. यशवंत जी की इतनी सु्न्दर कविताओ को पढवाने के लिये आभार ………बेहद खूबसूरत समीक्षा। बधाई आप दोनो को।

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  2. बहुत अच्छा लगा आपकी कलम से खामोशी को पढ़ना........
    आपका बहुत आभार और यशवंत को अनेकों शुभकामनाएं...
    सादर
    अनु

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